Tuesday, 2 June 2015

रंग भरने वाले हुए बे रंग


इन्टरवल एक्सप्रेस

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लखनऊ। कहते है हाथ का हुनर कभी  बेकार नही जाता है मगर ये मुहावरा वर्तमान समय में पेंटरों पर सटीक नही बैठता। डिजिटल युग के फ्लैक्स, ग्लोसाइन बोर्ड , एलईडी बोर्ड के दौर में पेंटिग कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले कारीगरों को अब दो जून की रोटी भी  कमाने में लाले पड़ गये है। दीवारों और बोर्ड पर अपने हुनर और कुची से चित्रों में जान डाल देने वाले कलाकार वर्तमान में अपने भविष्य को लेकर चितिंत है।कभी  शहर में इन पेंटरों का बोलबाला होता था लेकिन आज के समय में इनकी हालत दयनीय है। जो पुराने पेंटर थे वही इस पेशे को अपनाये हुए है। पुश्तैनी रुप से चली आ रही है पेंटिग कला शहर में अतिम पडाव में है।
अब सुनसान है गली
हजरतगंज में लीला सिनेमा के बगल वाली गली कभी  पेंटरों के रंगों से गुलजार रहती थी। यहां पर पेंटिग करवाने वालों को अपनी बारी का घंटो इंतजार करना पड़ता था दिन रात पेंटरों को काम से फुर्सत नही मिलती थी। अब पेंटरों को ग्राहकों का इंतजार करना पड़ता है। इस गली को पेंटरों वाली गली के भी  नाम से जाना जाता है लेकिन अब इस गली में नाम के अनुरुप कुछ नही मिलता।

डिजिटल युग की मार
वर्तमान समय में लोग आधुनिकता के दौर से गुजर रहे है। इस आधुनिकता के दौर में जो पीछे छूट रहा है वो है पुराने समय से चली आ रही प्रचलित कलात्मक शैली। कला को दीवारो पर उकेर कर उनमें कूची और बू्रसों के सहारे जान डाल देने वाले पेंटरों की रोजी रोटी  कम्प्यूटरीकरण के आने से छीन गई है। फ्लैक्स और ग्लोसाइन बोर्ड पेंटिग के मुकाबले कम खर्चीला है और जल्दी हो जाता है।


दस सालों में आया बदलाव 

सन 2005 के बाद डिजिटल युग ने तेजी से जगह बनाई है। इसमें किलियरटी और समय की बचत होने के कारण लोगों ने इसमें ज्यादा रुचि दिखाई है। इन दस सालों में पेंटर अपने जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे है। उनका वर्तमान हशिये पर है ऐसे में भविष्य में अपने बच्चों  को इस काम में लाने के बजाय वो कोई दूसरा काम करवाने को मजबूर है।
अब तो घर चलाना भी  मुश्किल
दस साल पहले पेंटर प्रतिदिन आठ सौ से एक हजार रुपये तक कमाते थे मगर आज दो सौ रुपये भी कमाने में लाले पड़ जाते है।  ऐसे में बच्चों की पढ़ाई तो दूर की बात घर का ही खर्चा नही चल पा रहा है। पहले पेंटिग करवाने के लिए लोगों की लाइन लगती थी अब दिन भर  बैठने के बाद भी  कभी  कभी  ऐसा होता है कि एक भी  ग्राहक नही आता।

कई लोगों ने बंद कर दिया काम
पेंटरों के कामों में गिरावट और कोई भविष्य न होने के कारण कई लोगों ने तो पेंटर का पेशा ही छोड़ दिया। रवि जो कभी  सबसे अच्छा और बेहतरीन पेंटर हुआ करता था मगर आज के समय में वो स्कूल में काम कर रहा है। वहीं सरवन जो कभी  पेंटर हुआ करते थे मगर आज क्लब लाइन पर वो चाय की दुकान लगाकर घर चला रहे है।

वर्जन:::::::
1... लीला सिनेमा वाली गली में पेंटरों की दुकानें लाइन से हुआ करती थी मगर आज एक दुक्का लोगों की ही दुकानें बची है। इस गली की रौनक ही पेंटरों से थी मगर वक्त के साथ सब बदल गया बस हम पेंटरों के हालात और बिगड़ गये। .......... सुरेंद्र पेंटर

2.....मैंने पेंटिग करने का काम जब शुरु किया था तब तो बहुत मजा आता था और काम भी  खूब रहता था। क•ाी सपने में भी  नही सोचा था कि आने वाले समय में काम की इतनी परेशानी होगी कि घर चलाना •ाी मुश्किल हो जायेगा। अब इस उम्र में कोई दूसरा काम भी  तो नही कर सकते बस जैसे तैसे जिंदगी काट रहे है। .......सुंदर पेंटर

3.....शहर के किसी भी  कोने में चला जाते तो एक न एक पेंटर मिल ही जाता था लेकिन अब ढूढ़ने पर भी  पेंटर नही मिलते। मैंने भी  पेंटिग से ही शुरुवात की थी मगर बक्त के साथ सब बदलना पड़ा नही तो बच्चों कीी पढ़ाई और घर चलाना भी  मुश्किल हो जाता। मैंने अब पेंटिग के साथ ग्लोसाइन और फ्लैक्स का भी  काम शुरु कर दिया। जिससे खर्चा निकल रहा है।...दिनेश पेंटर


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