Monday, 22 June 2015

विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रहे दल


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। देश प्रदेश के  विकास के लिए जितनी अहमियत सत्ता पक्ष की होती है उतनी ही अहमियत विपक्ष की भी  होती है। यदि विपक्ष मजबूत नहीं होगा तो सरकारें भी  काम नहीं कर पाती। विपक्ष में रहते हुए भी  पार्टियां प्रदेश के विकास में अहम •ाूमिका निभाति  है। विपक्ष की भूमिका हमेशा ही रचनात्मक होती है। व प्रदेश के लिए सकारात्मक होती है। लोकतंत्र के लिए सरकार के साथ विपक्ष का भी  होना उतना ही जरुरी है जिस तरह हर कार्य के लिए सरकार की जवाबदेही बनती है वैसे ही विपक्ष की भी भूमिका  होती है कि वो सरकार के कार्यों पर नजर रखे।

सरकार के कार्यों पर नजर रखना विपक्ष का काम
विपक्ष का काम होता है कि सरकार द्वारा जो कार्य करवाये जा रहे है वो जनहित में है कि नहीं इस पर नजर रखना। कई बार सरकार द्वारा ऐसा कार्य भी  किया जाता है जो पूर्ण रुप से  जनता के हितों के अनुरूप नहीं होता। ऐसे में विपक्ष द्वारा चुप रह जाना एक तरह से सरकार का मौन समर्थन करना होता है। यहीं  से शुरु हाती है विपक्ष की भूमिका   क्योंकि सरकार के किसी भी  गलत निर्णय का विरोध करना उनका नैतिक कर्तव्य है। विपक्ष का काम सरकार को ऐसा करने से रोकना जो जनता के हित में अनुकूल न हो कई बार सरकार अपना अड़ियल रूख छोड़ने को तैयार न हो तो विपक्ष सदन के भीतर और बाहर अपना विरोध प्रकट कर सकता है। विपक्ष को यह अधिकार है कि अगर सरकार जनहित की भावनाओं को अनदेखी करते हुए कोई नीतिगत फैसला लेती है तो वह सदन में सरकार से उस पर बहस की मांग कर सकता है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर सरकार को रोकने के लिये सदन के भीतर कार्य-स्थगन प्रस्ताव ला सकता है।

इसके अलावा लोकतांत्रिक तरीके से जन-जागरुकता अभियान चलाकर आम जनता को सरकार की सच्चाई बताकर उसे सरकार के विरुद्व खड़ा कर सकता है। विपक्ष चाहे तो धरना, प्रदर्शन, घेराव आदि के माध्यम से सरकार के विरुध्द जन-आंदोलन चला सकता है। इस तरह से वह सरकार को अपना जन-विरोधी निर्णय वापस लेने के लिये मजबूर कर सकता है।

प्रदेश में विपक्ष की स्थिति नाम मात्र
प्रदेश में मौजूदा सपा सरकार पूर्ण बहुमत में है जिस कारण वो फैसले लेने के लिए बाध्य नहीं है। प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी बहुजन समाज पार्टी विपक्ष की भूमिका मिका में बिल्कुल भी  नजर नहीं आ रही है।  2012 के विधानसभा  चुनाव में करारी शिकस्त पाने के बाद से बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती तो जैसे गायब ही हो गई इसके अलावाप्रदेश की तीसरे और चौथे नंबर पर रही कांग्रेस और •ााजपा की पार्टियों ने कुछ हद तक विपक्ष की भूमिका निभाने  की कोशिश की मगर वो भी  पूर्ण रुप से विपक्ष की भूमिका  निभा  नहीं पाया। यही कारण है कि प्रदेश में बढ़ रहे क्राइम पर  सरकार पर कोई दबाव नहीं दिख रहा है क्योकि प्रदेश कि मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा ने विपक्ष की भूमिका ही नहीं निभाई  जिससे प्रदेश सरकार पर कोई दबाव नहीं बना। इसके अलावा कई मुददों पर विपक्षी दल •ााजपा और कांग्रेस ने सरकार पर करारे वार किये मगर उनको जमीन पर उतारने पर जनता के बीच लाने में असफल रहे।
मुददे कई पर नहीं हुआ विरोध
पीसीएस परीक्षा का पेपर लीक, बिगड़ती कानून व्यवस्था हो, संप्रदायिक दंगे हो, सरे आम मर्डर हो, लूट हो, पत्रकार को मंत्री के खिलाफ लिखने पर जलाकर मार डालने वाली घटना हो, बेलगाम मंत्रियों के ऊपर लग रहे आरोपों पर •ााजपा कांग्रेस ने जुबानी जंग तो शुरु की मगर उसको जमीन पर नहीं उतार पाये जिसके कारण कुछ समय बाद ये सब मुददे बंद हो गये ।अभी  हाल में ही पत्रकार को जिंदा जलाकर मार डाला गया जिसमें सरकार के मंत्री का नाम शमिल है इसके बावजूद विपक्षी पार्टियों ने बयान जारी कर विरोध प्रकट किया बल्कि ये एक ऐसा मुददा है जिसमें सरकार को घेरा जाये तो होने वाले चुनाव में सरकार को नुकसान और विपक्ष को फायदा मिल सकता है। तीन साल में सरकार के विरुद्व कोई भी  बड़ा आंदोलन नहीं किया गया। पेपरबाजी ओर बयानबाजी तो खूब हुई।
इस वक्त प्रदेश में सरकार के विरुद्व सबसे बड़ी पार्टी के रुप में •ााजपा उभर  के सामने आ रही है । लोकसभा के चुनाव के बाद भाजपा  के दिन बदल गये जनता में एक बार फिर इस पार्टी में विश्वास जाग उठा हुआ है। अपने तीखे तेवर से दिल्ली का सिंहासन हासिल करने के बाद प्रदेश में पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन पार्टी प्रदेश सरकार के खिलाफ उस स्तर पर विरोध कर विपक्ष की भूमिका  नहीं निभा  रही जो उसको निभाना  चाहिए। पार्टी के ऊपर से लोकसभा  चुनाव की जीत की खुमारी उतरने का नाम ही नही ले रही है। ऐसे में वो प्रदेश सरकार का विरोध करे भी  तो कैसे। इसी तरह कांग्रेस का भी  हाल है फिलहाल तो कांग्रेस अभी  अपनी जमीन तैयार करने में लगे है। लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए काफी मायने रखते है। प्रदेश की जनता में सरकार द्वारा कराये गये विकास कार्यों का बखान किया जा रहा है जिसको जनता जान भी  रही है। मगर प्रदेश में बिगडती कानून व्यवस्था और सरकार के भ्रष्ट  मत्री व कानून को ताक पर रखने वाले नेताओं की भी  चर्चा कुछ दिन जो होती है मगर फिर वो  खत्म हो जाती है। वजह विपक्ष का अपना काम ढंग से न नि•ााना है। विपक्ष का मजबूत होना इस बात का प्रमाण होता है कि प्रदेश में जंगलराज या एकाधिकार नहीं हो सकता।
#सपा #विपक्ष #बसपा #प्रदेश #भाजपा 

Wednesday, 17 June 2015

पंचायत चुनाव की बिछने लगी बिसात


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही ग्राम पंचायतो में संभावित  प्रत्याशियों ने अपना प्रचार शुरु कर दिया है। पंचायत चुनावों का औपचारिक एलान भले ही अभी  न हुआ हो, लेकिन चुनावी बिसात पर वोटो की मोहरे बिछने लगी है। पंचायत के ग्राम प्रधान किसी भी  हाल में बचे कार्यकाल के लिए मन मुताबिक काम करवा कर लोगों के बीच फिर से विकास का नारा देने की तैयारी में लगे हुए है। वहीं दूसरी तरफ पुराने प्रधान प्रत्याशी अपना रुतबा कायम करने के लिए मौजूदा प्रधान पर आरोप पर आरोप लगाकर उनके वोट बेंक में सेंध मारने की तैयारी कर रहे है। आलम ये है कि पंचायत चुनाव में वो स•ाी हथकंडे अपने जा रहे जो देश और प्रदेश के सेंट्रल हॉल में पहुॅचने के लिए होते है। साम दाम दंड भेद का ऐसा चक्रव्यूह रचा जाता है कि सामने वाला समर्पण के अलावा किसी काम का नहीं रहता कुछ ऐसा ही राजधानी समेत ग्रामीण इलाकों में होने लगा है। शाह और मात का खेल इतना बुरा है कि लोग खून बहाने से भी  नहीं चूकते। ग्राम पंचायत के चुनाव अपनाये जाने वाले रणनीति पर प्रकाश डालती एक रिपोर्ट

हाल की कुछ घटनाएं
पंचायत चुनाव हलाकि अक्टूबर या सितबर में होने है मगर उनको लेकर संभावित प्रत्याशियों ने अभी  से तैयारियां तेज कर दी गई है। इसके लिए वो साम दाम दंड भेद वाली नीति का पालन कर रहे है। हाल ही की कुछ घटनाओं ने ये साबित कर दिया है कि इसबार चुनाव सिर्फ पैसे या व्यक्तिगत रुप से नहीं लड़ा जाने वाला है। इस बार के चुनाव में पिछल्ले बार के चुनाव से ज्यादा केस और खून खराबा होने वाला है।
केस एक- अभी  हाल ही में कुछ दिन पहले अमेठी में प्रधान ने अवैध कब्जे से रोका तो दूसरे पक्ष ने उसको जमकर पीटा और लहूलुहान कर दिया। इसमें आरोपी प्रधान पद का संभावित उम्मीदवार है। इसलिए इस घटना को पंचायत चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है जो काफी हद तक सही भी  है।
केस दो- उन्नाव क्षेत्र में प्रधानी चुनाव की पुरानी रंजिश के चलते विरोधी पार्टी ने 7 से 8 साल के बच्चों पर गैंगरेप का आरोप लगा दिया। यहीं नहीं उनके खिलाफ एफआईआर भी  दर्ज हो गई।

केस तीन- बेंती गांव में पूर्व प्रधान ने मौजूदा प्रधान पर विकास कार्य के लिए आये पैसे में 8 लाख रुपये के गबन का आरोप लगाया है। पूर्व प्रधान ने इसकी शिकायत जिला प्रशासन से भी  की है जिसकी जांच चल रही है।


शुरु हुई खेमेबाजी
पंचायत चुनाव के त्रिस्तरीय चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही  प्रत्याशियों ने होर्ल्डिंग्स और बैनर के माध्यम से प्रचार शुरु कर दिया है। इसके साथ ही घर घर जाकर संपर्क भी  शुरु कर दिया है। अपनी दावेदारी को मजबूत करने के चौपाल लगनी भी  शुरु हो गई है शाम होते ही सं•ाावित प्रत्याशियों के घरो के आगे जमावड़ा बताता है कि पंचायत चुनाव की तैयारियां अभी  से शुरु हो गई है।
पैसे का जमकर हो रहा है इस्तेमाल
पंचायत चुनाव में पिछल्ली बार एक प्रत्याशी पर कम से कम बीस लाख रुपये का खर्चा बैठा था इस बार के पंचायत चुनाव के माहौल को देखते हुए ये खर्चा बढ़ कर चालीस लाख तक जा सकता है। इतने पैसे में तो विधायकी के  चुनाव लड़े जाते है। मगर वर्तमान समय में पंचायत के चुनाव में इतना पैसा खर्च हो रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायती चुनाव में कितना फायदा होता है। लोग चुनाव के लिए अपनी जमीने तक बेंच रह े है।

शुरु हुई उठा पटक
पंचायती चुनाव के नजदीक आते ही पंचायती क्षेत्रो में एक बार फिर पुरानी रंजिशे पनापने लगी है। पुराने प्रत्यशियों ने मौजूद प्रधान पर घोटालों का आरोप लगा कर उनको कानूनी दांव पेज में उलझाना शुरु कर दिया है। इसके साथ एक दूसरे के समर्थकों पर फर्जी मुकदमें करवाकर उनको जेल तक भेजने की तैयारी होने लगी है। इस लड़ाई का सीधा सा मकसद है कि अपनी ताकत का एहसास करवाना। अपनी ताकत के जरिये चुनाव लड़ने वाले लोग खून खराबा करने में •ाी पीछे नहीं हटते है। चुनाव के नजदीक आते ही गांवों में प्रत्याशियों ने अपने गुट को मजबूत करना शुरु कर दिया है। विधान स•ाा चुनाव की तर्ज पर ही यहां पर भी  अपने विरोधियों को फर्जी केस में फंसाकर उनको चुनाव लडने से वंचित करने की योजना पर काम हो रहा है जिसमें पैसे के साथ पुलिस •ाी बखूबी साथ दे रही है।

राजनैतिक पार्टियों का प्रत्याशियों को संरक्षण
इन चुनावों पर पार्टियों का द्वारा प्रत्याशियों को संरक्षण दिया जाता है क्योकि बड़े चुनावों में निर्वाचित  ग्राम प्रधान जिला पंचायत सदस्यों की बड़ी भूमका होती है। जिसको लेकर पार्टियां गं•ाीर हो चली है। उनकी पार्टी को विधान सभा  और लोकसभ  के चुनावों में वोट मिल सके। ऐसे में बड़ी पार्टियों के लिए जमीन तैयार करने का काम ये चुनाव करते है।

वर्जन
प्रधानी के चुनाव को लेकर तनाव की बात सामनेआयी है। किसी भी दशा में फर्जी मुकदमें दर्ज नही किये जायेंगे। सभी  थानों को इसके लिये निर्देशित कर दिया गया है। सभी  मामलों में पुलिस को जांच के बाद कार्यवाही करने के कहा गया है। डीआईजी आर के चतुर्वेदी

#पंचायत #चुनाव #बिसात #गाँव 

Monday, 15 June 2015

पंचायती चुनाव की सुगबुगाहट बदलने लगी गावो की फिजा


जीस्ट
इस समय पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही गांवो और पंचायती चुनावी क्षेत्र की फिजा बदल गई है। अब सुबह से लेकर शाम तक चौपाल लगने लगी है साथ ही शाम को मिलने वाली दवा भी  सुबह से मिलने लगी है। इससे इतर प्रत्याशी अपनी जीत के लिए सभी  समीकरण को बनाने में लगे हुए है। प्रधानी का लालच कहे या रुतबे का जलवा कि भाई भाई  के खिलाफ है बाप बेटे के खिलाफ है। इस चुनाव में गांव की तस्वीर बदलने की बात कहके लोग अपने जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपना रहे है जो बड़े बड़े चुनाव में अपनाया जाता है। पैसे से लेकर जाति बिरादरी धर्म तक की राजनीति करने में लोग पीछे नहीं हट रहे है। इससे गांव के विकास के लिए होने वाले पंचायत  चुनाव अपना मूल रूप से भटक  चुके है। प्रदेश में पंचायत चुनाव अब पैसे और बंदूक के नोंंक पर होने लगे है जिससे गांव की ही नहीं बल्कि देश की भी  चुनावी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। खर्च के मामले में विधायकी के चुनाव भी  फेल है।



इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। पंचायती चुनाव भारतीय राजनीति की पहली और महत्वपूर्ण सीढ़ी है। देश की राजनीति की शुरुवात ही पंचायती चुनाव से होती है। आजादी के बाद से शुरु हुए पंचायती चुनाव में पहले की अपेक्षा आज के दौर में काफी बदलाव आ गये है। राजनीति की नींव ही अब काफी हद तक कमजोर हो गई है। इन चुनावों में भी  अब साम दाम दंड का उपयोग होने लगा है। वर्चस्व और प्रधानी रंजिश के चलते गांव की गलियां खून के रंग में रंग जाती है। पैसे के साथ खून का भी  बहना अब आम हो गया है। पिछल्ले वर्ष चुनाव में पैसा का बोलबाला था इस बार का भी  पंचायत चुनाव रुपये और बंदूक के दम पर होता नजर आ रहा है। पंचायत चुनाव के होने में अ•ाी तीन से चार महीने बाकी है। प्रशासन की तैयारी अभी  पूरी नहीं हुई है मगर प्रधानी का चुनाव लड़ने वाले लोगों ने अपनी पूरी तैयारी कर ली है। परियीमन से लेकर वोटो के वर्गीकरण तक में सभी  प्रत्याशी अपनी जीत को सुनिश्चित करने में लगे हुए है। इसबार के चुनाव में पैसा बोलता है कि तर्ज पर होने जा रहा है। प्रशासन इसको रोकने में कितना सफल होगा ये तो वक्त ही बतायेगा।

होर्ल्डिंग्स के जरिये शुरु हुआ प्रचार
एमएलए और एमपी की तर्ज पर प्रधान प्रत्याशियों ने भी  होर्ल्डिंग्स के जरिये अपना प्रचार प्रसार शुरु कर दिया है। अपने मनपसंद नेता की तस्वीर के साथ अपनी तस्वीर लगाकर अपना रुतबा दिखाने में ये प्रधान प्रत्याशी •ाी पीछे नहीं है। होर्ल्डिंग्स पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में प्रधान प्रत्याशियों ने अपने घोषणा पत्र भी  बनवाने शुरु कर दिये है जिसमें पंचायती क्षेत्र की प्रमुख समस्या का अंकित किया जा रहा है।

परिसीमन को लेकर मंत्रियो और नेताओं ने शुरु की जोर आजमाइश
आजादी के बाद देश में जब पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई, तब गांधी के ग्राम्य स्वराज्य को पूर्ण करने का सपना था। तब यह सोचा भी  नहीं गया था कि पंचायतें इस तरह कलह का अड्डा बनेंगी, गांव के गांव विभजित होंगे। अब तो खेती बेचकर चुनाव लड़े जा रहे हैं। पहले पंचायत के चुनाव में गांव इकट्ठा होता था, हाथ उठाकर वोट करता था और प्रधान चुन लिया जाता था। गांव में ही न्याय पंचायतें छोटे-मोटे विवाद सुलझा देती थीं। अब न्याय पंचायतें समाप्त हो चुकी हैं। पंचायत चुनाव में इस बात पर जोर आजमाइश हो रही है कि पंचायतों को कैसे आरक्षित कराया जाए या आरक्षित होने से बचाया जाए। इसके लिए विधायक से लेकर मंत्री तक तैयार बैठे हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ को सामने रख कर पंचायतों का परिसीमन कराते रहे हैं। यही कारण है कि 20 साल में पंचायतों के परिसीमन पर कोई एक नीति नहीं बन पाई।
जुआ की तरह है पंचायत चुनाव
लोग का मानना था कि प्रधान बनकर लोगों की सेवा की जाती थी मगर वर्तमान समय में ऐसा बिलकुल नही है पानी की तरह पैसा बहाने का मतलब है कि कि वो समाज सेवा नही बल्कि चुनाव जीत कर उस पैसे को ब्याज समेत वसूल करना है। सरकारी योजनाओ का अपने हित के लिए इस्तेमाल करके उसका फायदा उठाते है। इसके अलावा शहर से लगे गांव के जमीन के रेट वर्तमान समय में आसमान छू रहे है जिससे प्रधान ग्राम समाज की जमीन का सौदा प्रापट्री डीलरो से करके मोटा पैसा वसूलते है। इसके साथ ही जो रुतबा होता है सो अलग।
योजनाओं में पारदर्शिता की कमी से बढ़ा भ्रष्टाचार
सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की कमी से •ा्रष्टाचार ज्यादा बढ़ गया है। सरकारी योजनाएं जैसे मनरेगा, मिड डे मिल जनता के लिए कम, प्रधानों और कुछ अफसरों के लिए कामधेनु साबित हुई है। मिड-डे मील के •ाुगतान में  स्कूल के प्रधानाध्यापक और प्रधान के हस्ताक्षर होते हैं। इन दोनों की मिली •ागत से बच्चो को मिलने वाला खाना या तो इनके घर पहुंच जाता है या बाजार में बिक जाता है। इसके अलावा इंदिरा आवास को लेकर लेन-देन हो रहा है। पंचायते यानी छोटी सरकारों को प्रशासनिक दर से मजबूत नहीं किया गया, लेकिन योजनाओं में आने वाला पैसा स•ाी को दिख रहा है।
चुनाव में खर्च हो जाते है लाखो रुपये
पंचायत चुनाव में पिछल्ली बार एक प्रत्याशी पर कम से कम बीस लाख रुपये का खर्चा बैठा था इस बार के पंचायत चुनाव के माहौल को देखते हुए ये खर्चा बढ़ कर चालीस लाख तक जा सकता है। इतने पैसे में तो विधायकी के  चुनाव लड़े जाते है। मगर वर्तमान समय में पंचायत के चुनाव में इतना पैसा खर्च हो रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायती चुनाव में कितना फायदा होता है। लोग चुनाव के लिए अपनी जमीने तक बेंच रह े है।

परिवार के हिसाब से दिया जाता है पैसा
ग्राम पंचायत चुनाव में जब नोटो के जरिये वोट खरीदने का दौर शुरु होता है तो उसमें परिवार में मौजूद लोगों की संख्या के आधार पर पैसे दिये जाते है जितना बड़ा परिवार उतनी ही मोटी रकम दी जाती है। पिछल्ली बार बड़े परिवार के मुखिया को तीन हजार रुपये तक का एक आदमी के वोट की कीमत दी गई थी। इसबार ये पैसा पांच हजार रुपसे प्रति व्यक्ति तक जा सकता है। इसके साथ ही पैसे पर बिकने वाले वोट पांच सौ रुपये से लेकर पांच हजार तक बिकते है। ये पैसा वोट पड़ने सुबह वाली रत से पहले दिया जाता है।

आकंडे
प्रदेश में ग्राम पंचायतो की संख्या 51914 है जिसमें ग्राम पंचायत वार्ड 652773 है यहां पर कुल मतदाता 113728542 है जिसमें पुरुष 63360787 व महिलाएं 50367755 है। इसके अलावा राजधानी में ग्राम पंचायतो की संख्या 498 है ग्राम पंचायत वार्डों की संख्या 6306 है। राजधानी में कुल मतदाता 1018501 है जिसमें पुरुष मतदाता 539929 है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 478572 है।
#पंचायत चुनाव #पैसा #

छवि साफ करने की कवायद में पलीता लगाते मंत्री



इन्टरवल  एक्सप्रेस
लखनऊ। सत्ता का नशा कहे या पद का अहंकार ,तमाम नसीहतोें  के बाद भी  समाजवादी पार्टी के नेता और मंत्री सुधरने का नही ले रहे है। आलम ये है कि सपा सरकार के मंत्री और नेता खुद को कानून और सरकार से ऊपर समझने लगे है। नेता अपने सत्ता के  मद में ऐसा चूर है कि समाजवाद का मतलब तक •ाूल गये है। कई बार मुख्यमंत्री व सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव  की चेतावनी का असर देखने को नहीं मिल रहा है। जिससे सपा की न सिर्फसाख पर बटटा लग रहा बाल्कि सरकार की विकास वाली छवि धूमिल करने का काम हो रहा है। जिसका परिणाम ये है कि विरोधियों कोभी  सरकार को घेरने का बैठे बैठाये मौका मिल रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर  पहले से ही सरकार चिंतित है वही कानून तोड़ने पर आमदा  इन मंत्रियों  ने इसको सच साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी है।

विकास पर भारी पड़ते मंत्रियों के कारनामे
एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रदेश के विकास की बात कर रहे है  वहीं उनके मंत्री इस विकास को विनाश में बदलने में लगे हुए है। जिसके चलते मुख्यमंत्री की छवि के साथ सरकार का भी  दामन दागदार हो रहा है। मेट्रो परियोजना, महिला सुरक्षा, आईटी हब जैसी प्रदेश की तरक्की के लिए बनी योजनाओं का प्रचार प्रसार न हो पा रहा हो लेकिन मंत्रियों की कारगुजारी पूरे प्रदेश में गूंज रही है। कई बार हिदायत देने के बावजूद मंत्री सुधरने का नाम नहीं ले रहे है। उनके कारनामे भी  ऐसे है कि जिसमेें विकास का मुददा दब जा है और सरकार को चारों तरफ से आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है।

मंत्रियों के कारनामें
हाल ही में पिछड़ा वर्ग राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा पर हत्या का आरोप लगा है पत्रकार जोगेंद्र को पुलिस वालों ने घर में घुसकर पत्नी के सामने मिटटी का तेल डालकर इस लिए फूंक दिया क्योकि  पत्रकार ने फेसबुक पर मंत्री के कारनामों का खुलासा कर दिया था। पत्रकार का पोस्ट एक मंत्री को नगवार गुजरा कि उन्होंने उसकी जान लेली।
2:: राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त कैलाश चौरासिया पर एक आरटीओ से मारपीट और रंगदारी मांगने का एक ताजा मामला सामने आया है। आरोप है कि मिर्जापुर के आरटीओ चुन्नी लाल को न सिर्फ अपने घोष बस इतना था कि हाई कोर्ट के आदेश पर बाबू को ज्वाइनिग दे दी थी जिससे खफा मंत्री जी अपने पद प्रतिष्ठा को •ाूल मारपीट पर उतर आये। क्ेलाश चौरासिया पर इसके पहले भी  डाकिया पर मारपीट का आरोप लग चुका है।

3:: बीते दिनो समाजवादी के शिक्षा मंत्री कैबिनेट मंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह भी  अपनी मर्यादा लांगते नजर आये । गोंडा के व्यापारी पुत्र ने मंत्री के गाड़ी रोके जाने की खबर की कटिंग वाटस अप के ग्रुप में डाल दी थी फिर क्या था मंत्री जी का पारा सातवे आसमान पर पहुंच गया पंडित सिंह ने फोन पर सैकड़ो गाली दी और जान से मारने की धमकी भी  दी।

4::: पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री और योजना आयोग के सदस्य इकबाल अली ने भी  सरकार को बदनाम करने में कोई कमी नही की। फैजाबाद से लौटे हुए बाराबंकी के जैदपुर थाना क्षेत्र में लगे टोल टैक्स में पूर्व मंत्री के गुर्गो ने न सिर्फ टोल कर्मचारियों से मार पीट की बल्कि असलहों से फायरिंग की। पूर्व मंत्री के दंबगाई की ये तस्वीर टोल टैक्स पर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। पुलिस ने इस मामले में गनर और डाइवर को तो गिरफ्तकार कर लिया वहीं मंत्री को दूसरी गाड़ी में बैठा कर फरार करा दिया।
अगामी चुनाव में उठाना पड़ सकता है नुकसान
समाजवादी पार्टी के नेताओं और सरकार के मंत्री ही पार्टी के लिए खतरा बनते जा रहे है। जिस तरह से मंत्रियों और नेताओं पर आरोप लग रहे है उससे न सिर्फ सरकार की छवि खराब हो रही है बाल्कि उसके मिशन 2017 भी  खतरे में पड़ सकता है। हाल ही में सरकार के मंत्रियों और नेताओं पर हत्या,मारपीट, रंगदारी जैसे संगीन अपराधों में नाम आने से सरकार की काफी किरकिरी हुई है और सरकार की छवि को भी  काफी नुकसान हुआ है। विवादित बयान को लेकर भी  सरकार के कई मंत्रियों का नाम आये दिन आता रहता है। हाल में ही महिलाओं के ऊपर विवादित बयान देने वाले तोता राम मामले का मुख्यमंत्री ने स्वत: संज्ञान में लेते हुए फटकार लगाई थी उसके चंद दिन बाद ही राज्यमंत्री कैलाश चौरासिया द्वारा आरटीओ अधिकारी को मारने पीटने व रंगदारी मांगने का मामला प्रकाश में आया है। इन मामलों से साफ होता है कि सरकार के मंत्री ही मुख्यमंत्री की बात को गं•ाीरता से नहीं ले रहे है। ऐसे में सरकार के अगामी चुनाव की तैयारियों में ये मंत्री ही रोड़ा बनते जा रहे है।


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Monday, 8 June 2015

सिर्फ जिस्म ही नही ज़हेन भी छालनी कर जाता है एसिड अटेक


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। एसिड अटैक एक अमानवीय और •ायावह अपराध है। एसिड अटैक अपराध हत्या जैसे जघन्य अपराध से •ाी खतरनाक है। एसिड अटैक के शिकार लोग जिंदा तो रहते है मगर समाजिक और मानसिक रूप से उनकी हत्या हो चुकी होती है। वो समाज में मिलने , उठने बैठने का आत्मविश्वास नहीं जुटा पाते। एसिड अटैक में शरीर के जिस •ाी हिस्से पर एसिड पड़ता है वो हिस्सा पूरी तरह झुलस जाता है खास कर जब चेहरे पर पड़ता है तो वो पूरी तरह झुलस जाता है और ऐसी •ायावह हालत में पीड़ित अपने चेहरे को आइने में •ाी देखने का साहस नही कर पाते हैं। ज्यादातर हमले में पीड़ित की मौत तो नही होती मगर उसकी बाकी बची जिंदगी मौत से •ाी बदतर हालत में गुजरती है।
एसिड अटैक का मकसद चेहरे को खराब करना होता हौ एसिड अटैक में चौथी डिग्री का बर्न होता है इसमें त्वचा की पहली नही बल्कि चौथी परत तक जल जाती है इसके घाव सही होने में सालों लग जाते है मगर फिर •ाी पहले जैसी त्वचा नही आ पाती। समय के साथ दिक्कतें कम होने के बजाय और बढ़ जाती हंै जिसके कारण पीड़ित को धूप मे निकलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।इसके शिकार लोगों को असीम दर्द के साथ समाज से इतर जिन्दगी जीनी पड़ती है।  क•ाी क•ाी उसको अपने ही घर में •ोद •ााव का दर्द झेलना पडता है।

क्या कहता है कानून
18 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव करते हुए तेजाब को जहर की श्रेणी में रखा है। अब कोई •ाी दुकानदार बिना लाइसेंस के तेजाब नहीं बेच सकते है। इसके अलावा और •ाी संशोधन हुए है जिसमें पीड़िता को तीन लाख का मुआवजा दिया जायेगा। 15 दिन के अंदर एक लाख रूपये देना अनिवार्य है। आरोपी को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती हैं।

हादसों की वजह
एसिड अटैक की कई वजह हो सकती है जैसे दहेज की मांग न पूरी होना, घरेलू कलाह, शादी का प्रस्ताव ठुकरा देना, प्रेम प्रसंग, दुष्कर्म के प्रयास में विफल होना । ऐसे परिस्थिति होने में एसिड अटैक के केस ज्यादा होते है। लखनऊ में ही प्रेम प्रसंग और दुष्कर्म में विफल होने पर दो लड़कियों पर एसिड अटैक किया जा चुका है

सरकार नहीं करती मदद
सरकार की तरफ से एसिड अटैक में घायल युवती को पंद्रह दिन के अंदर आर्थिक मदद देने का सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आदेश दिया जा चुका है मगर इसके बाद •ाी सरकार की तरफ से इनको सही समय पर पैसा नही दिया गया है।
केस 1
समद कथा में काम करने वाली मीना के ऊपर घरेलू कलाह के चलते उनके पति ने ही तेजाब डाल दिया था। आज के समय में वो काम करके अपने तीनों बच्चों की परवरिश कर रही है उनका सबसे छोटा बेटा चौदह साल का हैं।


केस 2
2012 में आलमबाग निवासी कविता पर उनके प्रेमी ने ही तेजाब डाल दिया था। 25 वर्षीय कविता आरोपी नटखेडा निवासी फैज के शाप पर काम करती थी। वही दोनों के बीच अफेयर शुरू हो गया मगर कुछ महीनों बाद फैज की शादी हो गई । शादी हो जाने के बाद •ाी फैज कविता को लगातार रिलेशन में रहने का दवाब डालता रहा। कविता के मना करने पर उसके ऊपर फैज ने तेजाब डाल दिया। घटना के दो साल बाद •ाी आरोपी खुले आम घूम रहा है और कविता समाज से इतर जिंदगी जी रही है। साल में दो बार कविता की सर्जरी होती है। परिवार से सपोर्ट न मिलने के पर •ाी उसने हार नही मानी। वो समाज में जीने के लिए लगातार सघर्ष कर रही है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है।

केस 3
अशियाना निवासी 16 वर्षीय रेशम फातमा पर उनके रिश्तेदार ने ही बलात्कार का प्रयास किया। विफल रहने पर आरोपी ने रेशम के चेहरे पर तेजाब फेंक  दिया। हाल में ही रेशम को बेबी बे्रव अवार्ड •ाी दिया जा चुका है।


चुनाव आते ही दिखने लगा दलो का मुस्लिम प्रेम

इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय चुनावो में काफी हद तक निर्णायक भूमिका निभाते  है। चनाव आते ही मुस्लिम हित की बाते करने वाले नेताओं की लाइन लग जाती है लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनका कोई पुरसा हाल नही होता। 2017 में उत्तरप्रदेश के विधानसभ चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी  राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीके से प्रयास शुरू कर दिए हैं। प्रदेश के लगभग  17 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता किसी भी  राजनीतिक दल का भविष्य बनाने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाते  आये है। यह बात साफ है कि प्रदेश की 403 में से 100 से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदातों के द्वारा ही हार जीत का निर्णय होता है। हर बार की तरह इस बार भी  चुनाव आते ही सभी  प्रमुख दल सपा, कांग्रेस, बसपा मुस्लिमों को अपनी ओर रिझाने में लग गये है लेकिन इस बार मामला त्रिकोणी नहीं रहा क्योकि मुस्लिम विरोधी कही जाने वाली भाजपा  भी  इस बार मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जी तोड़ कोशिश में लगी है। फिलहाल अभी  ये कहना जल्दबाजी होगा कि प्रदेश का मुसलमान किसके साथ जायेगा। लेकिन ये बात तय कि इस बार मुसलमान जल्दी किसी के बहकावे में नहीं आने वाला है।
भाजपा  की कोशिश 
मुस्लिम विरोधी चेहरा होने के बावजूद भाजपा  इस बार मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने में लगी हुई है जबसे केंद्र में भाजपा  सरकार बनी है तबसे लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा मुसलमानों को देश भक्त  बताना और उनको पूरी सुरक्षा देने की बात कहना इस बात की ओर इशारा करता है कि मोदी सबका साथ सबका विकास वाले रास्ते पर चलकर प्रदेश का अगामी विधानसभा  चुनाव लड़ने की तैयारी में है। इसके अलावा केंद्र सरकार के एक साल पूरा होने पर जन जन जक सरकार की उपलब्धियां पहुंचाने के लिए पंपलेटो और बुक को उर्दू में छाप कर मुस्लिम बहुल इलाकों में बांटने के फैसले से विपक्षियों में हलचल मच गई है।

बसपा का भी  जागा मुस्लिम प्रेम
बसपा की बात की जाए, तो बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती मुसलमानों के नाम पर राजनीति तो खूब करती हैं, लेकिन वह सपा प्रमुख की तरह किसी मुस्लिम धर्म गुरु को अहमियत नहीं देती है।वहीं दूसरी तरफ सपा पर मुसलमानों को गुमराह करने का आरोप भी  जड़ देती हैं। बसपा सुपीमों को इस बार ये एहसास हो चला है कि अगामी विधानसभ  चुनाव में उनकी मुकाबला सिर्फ सपा से नहीं बल्कि भाजपा  से भी  होने वाला है यदि ऐसे में मुस्लिम समुदाय का समर्थन उनको नहीं मिला तो उनकी वहीं दुर्दशा हो सकती है जो 2012 के विधान सभा  चुनाव में हुई थी। इस बार  बसपा का इरादा किसी भी  तरह से सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाना है. देखना यह है कि वह अपने इरादों में कितना कामयाब होती है।

सपा भी  जुटी अपना मुस्लिम वोट बैक बचाने में
सपा ने 2012 के विधानसभा  चुनाव घोषणापत्र में 16 खास वादे किये थे तीन साल गुजर जाने के बावजूद उन पर अमल नहीं हुआ। सपा के मुस्लिम समुदाय से किये गये चुनावी वादो में सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्र आयोग और निमेष आयोग की सिफारिशों को लागू करना , मुसलमानों को रोजगार देना, आरक्षण देना और पिछड़े मुस्लिम इलाकों में स्कूल खोलना आदि थे। मुस्लिम समुदाय को सुरक्षा देने की भी  बात की गई थी मगर सरकार में हुए संप्रदायिक दंगों ने सपा की छवि पर बट्टा लगाने का काम किया है। इसके बावजूद सपा मुखिया और प्रदेश मुखिया मुस्लिम समुदाय सपा से जोड़कर रखने की कोशिश में लगे हुए है। अभी  हाल में ही उर्दू एकादमी का भी  उदघाटन किया है।

कांग्रेस भी  पीछे नहीं
अजादी के बाद प्रदेश में कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था मगर मौजूदा समय में प्रदेश की राजनीति नाम मात्र की रह गई है। पिछल्ले दो दशकों से कांग्रेस का प्रदेश में जनाधार लगातार गिरता ही गया है। उसका अपना वोट बैंक खिसक कर दूसरी पार्टियों में चला गया है । इसबार के लोकसभा  चुनाव के बाद तो प्रदेश में कांग्रेस की और दुर्दशा हो गई है। पार्टी प्रमुख जानते है कि इस बार प्रदेश के विधानसभा  चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा तो ये चुनाव उनके लिए संजीवनी बूटी का काम करेगी। इसी के तहत पार्टी अन्य समुदाय के साथ मुस्लिम समुदाय को भी  जोड़ने में लगी है। सपा सरकार पर दंगे को लेकर हमलावर होना या केंद्र की मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी बताना पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक प्रेम को दर्शाता है।

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Saturday, 6 June 2015

अब नही भाती गुरुओ की पाठशाला

इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। साल दर साल यूपी बोर्ड के रिजल्ट के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होती जा रही है मगर इसके साथ ही यूपी बोर्ड के हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में बच्चों की संख्या भी  कम होती जा रही है। पहले दस साल की अपेक्षा में अब यूपी बोर्ड के स्कूलों से लोगों का मोह भंग  होता जा रहा है। जिसका मुख्य कारण दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में वृद्धि और यूपी बोर्ड के स्कूलों में शिक्षा का गिरता स्तर है।
स्कूलों में वृद्धि छात्रो में गिरावट
यूपी बोर्ड के स्कूलो में लगातार बढोत्तरी हो रही है मगर उसके साथ ही उसमें प्रवेश लेने वालो छात्रो की संख्या में गिरावट हो रही है। मौजूदा समय में राजधानी में यूपी बोर्ड के स्कूलों की संख्या 720 है। पिछल्ले कुछ समय में स्कूलों की संख्या मे तेजी से इजाफा हुआ है। इस बार भी  यूपी बोर्ड की मान्यता लेने में दर्जनों स्कूल लाइन लगाये हुए है। जिस तेजी से यूपी बोर्ड मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ रही है उतनी ही तेजी से छात्रों की संख्या घट भी  रही है।
दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की संख्या बढ़ी
आज से एक दशक पहले तक यूपी बोर्ड के स्कूलों का बोलबाला था फिर राजधानी में दिल्ली बोर्ड के स्कूलों ने दस्तक दी और देखते देखते इन स्कूलों ने अपनी छाप बना ली। इनकी चमक के आगे सरकारी स्कूलों की छवि धूमिल हो गई। एक दशक पहले इन स्कूलों की संख्या दस से पंद्रह थी मगर मौजूदा समय में इन स्कूलों की संख्या 200 से भी  अधिक है।


शिक्षा स्तर में फर्क
यूपी बोर्ड और दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में शिक्षा के स्तर में भी  काफी फर्क है जिसकारण अच्छी शिक्षा ग्रहण करने और अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में अभिभावक  यूपी बोर्ड के स्कूलों के बजाये दिल्ली बोर्ड के स्कूलों को ज्यादा प्रथमिकता दे रहे है। यूपी बोर्ड में थोक के भाव स्कूलों में मान्यता दे दी है। इसके अलावा अगर दोनो बोर्ड के स्कूलो की पढ़ाई में तुलना की जाये तो दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की पढ़ाई यूपी बोर्ड की तुलना में ज्यादा हाई टेक है। यूपी बोर्ड के ज्यादातर स्कूलों में आज भी  अंग्रेजी को प्रायामिकता से नहीं पढ़ाया जाता है जबकि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में जो शिक्षा दी जाती है वो कंपीटिशन लेविल की होती है जिससे बच्चों को शुरु से ही उच्च स्तर की शिक्षा मिलने के कारण वो आगे कंपटिशन में आसानी से आगे निकल जाता है। पढ़ाई के साथ अनुशासन के मामले में •ाी दिल्ली बोर्ड यूपी बोर्ड से काफी आगे है।
वर्जन अभिभावक 
 खुर्रम नगर निवासी आमिर तस्लीम की बेटी शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में पड़ती है। यूपी बोर्ड के स्कूूल में एडमिशन न करवा आईएससीई बोर्ड के स्कूल में एडमिशन करवाने के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अनुशासन शिष्टाचार के चलते यूपी बोर्ड में एडमिशन नहीं दिलवाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाई के साथ अनुशासन भी  सिखाया जाता है जिसके कारण बच्चों शिक्षा के साथ अच्छा व्यवहार भी  सिखने को मिलता है।

2:::: अशियाना निवासी सिराज के दो बेटे है और दोनो ही दिल्ली बोर्ड के स्कूल में पढ़ते है। उन्होने कहा कि प्रतिस्पर्धा के दौर में अच्छी पढ़ाई ही बच्चो का भविष्य तय करती है यदि उनको अच्छी शिक्षा न मिल पाये तो उनका भविष्य भी  अंधकार मय हो जाता है। जहां तक यूपी बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाई का मामला है तो वो अभी  दिल्ली बोर्ड के स्कूलो से काफी दूर है।

स्कूल प्रधानाचार्य का वर्जन
लखनऊ पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य रुपाली पटेल ने बताया कि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में जो पढ़ाई होती है वो प्रतिस्पर्धा स्तर की होती है जिससे बच्चे आगे जाकर किसी इंजीनियरिंग या किसी और तरह के कंपीटिशन  में भाग  लेते है तो उनको स्कूल में पढ़ाई का काफी फायदा मिलता है। इसके अलावा कहां एडमिशन लेना है कहां नहीं ये अभिभावक  और बच्चों का फैसला होता है । दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में कंपीटिशन बेस पढ़ाई कराई जाती है। अच्छी पढ़ाई केसाथ बच्चों को अनुशासन में रहना •ाी सिखाया जाता है।

2::: खुर्रम नगर गर्ल्स कालेज के प्रधानाचार्य मोहम्मद तारिक के अनुसार यूपी बोर्ड में के ज्यादातर स्कूल हिंदी मीडियम है जबकि आजके समय में अंग्रेजी का अपना अलग महत्व है उसके बिना  अच्छी नौकरी नहीं मिलती है। इसके अलावा मान्यता देने में यूपी बोर्ड सबसे आगे है जिसके कारण हर गल्ली में स्कूल खुल गये है। उन स्कूलों को भी  मान्यता दे दी है जहां पर पढ़ाई ही नहीं होती इससे यूपी बोर्ड के साख पर असर पड़ा है।
वर्जन
वर्तमान समय में दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है जिसके चलते लोगों के पास विकल्प है। यूपी बोर्ड के स्कूलों में जहां तक शिक्षा के स्तर की बात है वो भी  इतना खराब नहीं है। इस बार के यूपी बोर्ड के रिजल्ट भी  काफी अच्छे गये है। :::::::::: प्रेम चंद बीएस ओ माध्यमिक शिक्षा


#सरकारी #स्कूल #खुर्रम नगर गर्ल्स कोलेज #माद्यमिक शिक्षा 

Friday, 5 June 2015

सीटें कम और छात्र ज्यादा कैसे मिलेगा दाखिला


एक तरफ सरकार सब पढ़े, सब बढ़े का नारा दे रही है और दूसरी तरफ स्नातक में प्रवेश के लिए निर्धारित सीटें ही इतनी कम है कि इंटर की बोर्ड परीक्षा में पास हुए सीबीएसई बोर्ड, यूपी बोर्ड व आईएससीई बोर्ड के छात्रों में से सबको प्रवेश मिलना नामुमकिन है। ऐसे में कई छात्र इस बार प्रवेश पाने में असफल रहेंगे। इसके अतिरिक्त एक तरफ सरकार इंटरमीडिएट में छात्रों को ज्यादा से ज्यादा नंबर देकर पास करने में लगी है मगर स्नातक की सीटों में कोई वृद्वि नहीं हुई है। पिछले तीन चार सालों से इंटरमीडिएट के रिजल्ट प्रतिशत में काफी बढ़ोत्तरी हुई है मगर उस अनुपात में स्नातक की सीटों जैसे बीए, बी कॉम, बीएससी की सीटों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। हर बार की तरह इस बार भी  कई हजार छात्र प्रवेश पाने में असफल रहेंगे। एलयू व डिग्री कॉलेजों में दाखिले के लिए स्नातक की लगभग 53000 सीटें हैं जबकि राजधानी में ही अकेले यूपी सीबीएसई और आईएससी बोर्ड के ही पास छात्रों की संख्या 66,986 हैं। इसके अलावा गैर जनपद से •ाी लग•ाग बीस से पच्चीस हजार छात्र राजधानी के प्रतिष्ठित कालेजों में प्रवेश पाने को आते हैं इस तरह 53000 सीटों  पर प्रवेश पाने के लिए लग•ाग 90000 छात्र अपनी किस्मत आजमायेंगे। जी-तोड़ मेहनत करके बोर्ड परीक्षा पास करने वाले छात्रों को यदि प्रवेश नहीं मिलेगा तो उसका जिम्मेदार कौन है?सीटें

लखनऊ। यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट का परिणाम आने के बाद धीरे धीरे तीनों बोर्ड के इंटरमीडिएट के रिजल्ट आ चुके हैं। अब छात्र स्नातक में प्रवेश पाने के लिए एक कॉलेज से दूसरे कालेज की भाग  दौड़ में लग गये हैं। मगर इस बीच सबसे बड़ी दुविधा यह है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के साथ डिग्री कॉलेजों में स्नातक की सीटें कम हैं और पास हुए छात्रों की संख्या ज्यादा है। इसके अलावा इस बार मनपसंद कोर्स की सीट पाने के लिए मेरिट की जंग होगी। एलयू व डिग्री कॉलेजों में दाखिले के लिए स्नातक की लगभ ग 53000 सीटें है जबकि राजधानी में ही अकेले यूपी सीबीएसई और आईएससी के ही पास छात्रों की संख्या 66,986 हैं। ऐसे में सीटें कम होने के कारण और पास हुए बच्चों की संख्या के ज्यादा होने के चलते, इस बार कई मेधावी छात्र-छात्राओं को प्रवेश नहीं मिल पायेगा जिससे उनका साल बर्बाद होने के कारण पढ़ाई भी चौपट होने की पूरी सं•ाावना है। इससे शिक्षा प्रणाली का गैर जिम्मेदाराना रवैया कहें या बच्चों की किस्मत। एक तरफ तो माध्यमिक शिक्षा और बोर्ड में छात्रों को भरपूर नंबर देकर उनको पास कर दिया जाता है मगर वहीं दूसरी तरफ स्नातक की सीटों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होती है जिससे पास हुए छात्रों और सीटों के बीच का अनुपात साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

मेडिकल और इंजीनियरिंग करने वालों को हटा दे तो भी  कम है सीट
स्नातक में दाखिले के लिए होगी जंग 
राजधानी में करीब 66 हजार से अधिक अ•यर्थी स्नातक में दाखिले के लिए आवेदन करेंगे। इसके अलावा गैर जनपद से आने वाले अलग हैं। इसमें से अगर इंजीनियरिंग व मेडिकल में दाखिला लेने वाले स्टूडेंट्स की संख्या करीब 15 हजार हटा भी  दी जाएगी तो भी  स्नातक में दाखिले की जंग रहेगी क्योंकि राजधानी के आसपास के जिलों के करीब 25 हजार स्टूडेंट जिनकी मेरिट अच्छी होगी वह एलयू व कॉलेजों में ही दाखिला लेने आएंगे। ऐसे में इस बार कट आॅफ सूची ऊंची जाएगी।
गैर जनपद से भी  आते हैं छात्र
राजधानी के कालेजों और विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के लिए आसपास के जिले सीतापुर, उन्नाव, हरदोई, रायबरेली, आजमगढ़, गोंडा बस्ती आदि जगहों से करीब 25 हजार अ•यर्थी यहां दाखिला लेने आते हैं। इंटर में 85 फीसदी से ज्यादा अंक पाने वालों की संख्या 18 हजार से ऊपर है। ऐसे में राजधानी के 66,986 छात्रों की भीड़  में इन छात्रों की भी  भीड़  बढ़ जाती है। राजधानी में इस बार पिछले साल के मुकाबले इंटरमीडिएट का रिजल्ट काफी अच्छा गया है। यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट की अगर बात की जाए तो यहां पर 50475 छात्र परीक्षा में शामिल हुए थे और इसमें से 45,929 छात्र सफल हुए। इनमें से लग•ाग 13 हजार छात्र ऐसे हंै जो 75 फीसदी से ऊपर अंक पाए हैं। 85 प्रतिशत से ऊपर नंबर पाने वाले करीब 9 हजार स्टूडेंट हैं। वहीं दूसरी ओर आईएससी (12 वीं) में 11,776 स्टूडेंट पास हुए हैं और यहां पर 85 प्रतिशत से ऊपर नंबर पाने वाले करीब 5 हजार स्टूडेंट हैं। इसी तरह सीबीएसई बोर्ड में 9281 अ•यर्थी पास हुए हैं और इसमें लगभाग  4000 छात्र ऐसे हैं जिनके 85 प्रतिशत से ज्यादा नंबर आए हैं।
शहर के प्रमुख कालेजों में प्रवेश के लिए हो रही मारामारी
लखनऊ विश्वविद्यालय, नेशनल पीजी कॉलेज, आईटी पीजी कॉलेज, अवध गर्ल्स कॉलेज, क्रिश्चियन कॉलेज, केकेसी, नवयुग कन्या पीजी कॉलेज आदि में इस बार दाखिले के लिए अ•यर्थियों में होड़ मचेगी। एलयू में कुल 3277 सीटें स्नातक में हैं जबकि डिग्री कॉलेजों में लगभाग  5300 सीटें हैं। ऐसे में कई छात्रों को इस बार प्रवेश नहीं मिल पायेगा।
सरकारी व विश्वविद्यालय संबधित कॉलेजों में सीटें
कॉलेज                       बी.ए                 बीकॉम             बीएससी
आईटी पीजी कॉलेज          580                   240              420
शिया पीजी कॉलेज            1046                 1020           670
शशि •ाूषण गर्ल्स पीजी कॉलेज   500                     -                   -
विद्यांत हिंदू पीजी कॉलेज          670                    320                -
अमीरुददौला इस्लामिया कॉलेज   280                   280             240
पंडित दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज  420                    80               100
नेताजी सु•ााष चंद्र बोस कॉलेज      410                   100              100
महाराजा बिजली पासी किला कॉलेज   240                    60               60
महामाया डिग्री कॉलेज                   420                    -                  -
अवध गर्ल्स कॉलेज                       400                  240              -
बीएसएनवी कॉलेज                    700                   240             700
डीएवी कॉलेज                         500                   -                 385
केकेसी                                 1080                 1080          840
करामत गर्ल्स कॉलेज                  1075                  60              180
कालीचरण पीजी कॉलेज                 500                   120             -
खुनखुनजी गर्ल्स कॉलेज                  385                   -                 -
क्रिश्चियन पीजी कॉलेज                460                    440            700
महिला पीजी कॉलेज                   960                      160           630
मुमताज पीजी कॉलेज                  650                     60             240
एपीसेन मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज         475                     80               -
कृष्णा देवी गर्ल्स कॉलेज               475                     -                   -
नारी शिक्षा निकेतन गर्ल्स कॉलेज      560                     80              100
नवयुग कन्या पीजी कॉलेज           700                    240            190
नेशनल पीजी कॉलेज                  440                   560             300
कुल                                13886                   5460           5855

इंटरमीडिएट में किस बोर्ड में कितने हुए पास
यूपी बोर्ड- 45929 हजार
आईएससी-11776 हजार
सीबीएसई -9281 हजार

एलयू में स्नातक की सीटें
बीए            1410
बीए आॅनर्स     60
बीकॉम           800
बीकॉम आॅनर्स      100
बीएससी मैथ्स        507
बीएससी बॉयो        280
एलएलबी आॅनर्स     120
कुल सीटें             3277

बीते साल एलयू की कटआॅफ सूची
कोर्स कट आॅफ (अधिकतम से न्यूनतम) प्रतिशत
बीएससी मैथ्स 94.688 से 90
बीएससी बॉयो 91.96 से 86.268
बीकॉम 91.163 से 85.742
बीकाम आॅनर्स 92.569 से 84.503
बीए 91.403 से 65


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ज़िन्दगी की ज़रूरत हो सकती है जानलेवा

इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। शहर में जैसे जैसे गर्मी का पारा बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे पीने के पानी की अहमियत बढ़ती जा रही है। सबसे ज्यादा पीने के पानी की दिक्कत राहगीरों और सड़क पर दौड़ते वाहन चालकों  को होती है। ऐसे में ठंडे पानी की मांग ज्यादा बढ़ जाती है। हर कोई बिसलेरी नहीं खरीद सकता इसलिए लोग पानी के पाउच खरीदते है। इन पानी के पाउच से प्यास तो बुझ जाती है मगर साथ ही कई बीमारियां भी  होने का खतरा बढ़ जाता है। शहर में खुलेआम पाउच के पानी की बिक्री हो रही है जबकि जिम्मेदार विभाग  आंखों पर पटटी बंधे बैठा है। गर्मी के मौसम में ये एक कारोबार के रुप में सामने आता है। जिसका बड़े पैमाने पर काम होता है। इस काम में बड़ो से लेकर बच्चे तक स•ाी लिप्त पाये जाते है।

 बस स्टैंड और चौराहे है मुख्य जगह
शहर के कई इलाकों सहित मुख्य  रूप से बस स्टैंड पर पानी का कारोबार चरम पर है। यहां पर निचले  स्तर की पॉलीथीन में दूषित पानी को भरकर बसों पर ओर चौराहों पर बेचा जा रहा है। गर्मी में गला सूखने और अपनी प्यास को बुझाने के लिए लोगों को मजबूरन इन पानी के पाउच को लेना पड़ता है। विशेषकर यात्री इन्हीं पालीथीन में भरे   दूषित पानी से को पी रहे है। शहर के बस स्टैंड पर हाथों में पाउच लिए आवाज लगाकर पानी बेचते बच्चे आसानी से देखे जा सकते हैं। लोग भी  मजबूरन इन्हें खरीदते हैं। पाउचों में भरा हुआ यह पानी अपेक्षाकृत साफ नहीं होता है। इन्हें आस पास के किसी भी  पानी के स्रोत से छोटी छोटी पॉलीथिनों में भर  लिया जाता है। उसके बाद बर्फ में ठंडा कर बच्चों को बेचने के लिए पकड़ा दिया जाता है। जहां बस स्टैंड पर गुजरने वाली बसों में और यात्रियों को अमूमन 2 रुपए में बेचते हैं।

स्वास्थ्य के  लिए घातक है दूषित जल
गर्मी में बेहाल लोगों के लिए पानी किसी अमृत से कम नहीं है। गर्मियों के मौसम में शुद्ध पेयजल स्वास्थ्य को ठीक रखने का सबसे अच्छा तरीका  है। लेकिन शहर में खुलेआम बि रहे इन पाउचों में भरा  हुआ दूषित पानी स्वास्थ्य के लिए काफी  नुकसान देह हैै। विशेषज्ञों की मानें तो पाउचों में जो पानी •ारा  होता है वो अमानक स्तर का होता है। जिसके कारण लोगों को पेट संबंधी रोगों और समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की तादाद में एक बड़ा हिस्सा दूषित पानी का सेवन करने वाले लोगों का होता है। चिकित्सकों के अनुसार गर्मी के मौसम में अधिक से अधिक शुद्ध पानी पीना चाहिए। साथ ही दूषित सामग्री के सेवन से भी  बचना चाहिए।
दूषित पानी पीने से इंसान को कई तरह की बीमारियां हो सकती है। शहर में खुले आम धड़ल्ले से पन्नी के पानी में कई तरह की बीमारियों को बेचा रहा है। दूषित पानी पीने से कई तरह की जानलेवा बीमारियां होती है जिनमें पीलिया, डायरिया, टाइफाइड आदि प्रमुख है। इसके अलावा त्वचा रोग, नेत्र रोग, पेट की तमाम बहुत सी गंभीर  बीमारियां होती है।

दस पैसे की पन्नी में बेचते है बीमारी

पान की गुमटी, परचून की दुकानों, और ढेलों पर 10 पैसे की पन्नी में आस पास के नल से सादा पानी •ारकर उसको बर्फ में लगाकर ठंडा करके बेचने का धंधा जोरो पर चल रहा है। इन पाउचों को एक रुपए से लेकर दो रुपए तक प्रति पाउच की दर से बेचा जा रहा है। इसके बावजूद स्वास्थ्य वि•ााग मूकदर्शक बना हुआ है।  इस तरह के दूषित पाउचों की बिक्री का कारबारों चरम पर पहुंच चुका है. जिस पर अंकुश लगाने वाला कोई •ाी नहीं है।
फायदा ही फायदा
पन्नियों में दूषित पानी को भरकर सड़क और बस स्टाप पर बेचने वालों के लिए ये एक ऐसा धंधा है जिसमें केवल फायदा ही फायदा है। इस गोरखधंधे लागत भी  नहीं आती लेकिन फायदा जमकर होता है। एक पानी के पाउच की कीमत दो रुपये से लेकर पांच रुपये तक हो सकती है। जिसमे लागत मात्र पैसों में आती है क्योकि ये लोग शहर में ही लगे पानी के पंप या सरकारी हैंडपंप से ही पानी को •ारते है और बर्फ में लगाकर उसको मनमाने दाम पर बेच देते है। दुकानदार गर्मी के तीखे तेवरों और प्रशासन के ढीले पड़े रवैये से पैसा बनाकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने में लगे हुए हैं।

ये है नियम
पानी बेचने के लिए फर्म का रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य है इसके अलावा आईएसओ से प्रमाणित होना भी  अनिवार्य है। पीने योग्य पानी बेचने के लिए उसका प्यूरीफाइड होना भी  जरुरी है। साथ ही पानी के पाऊच पर उसकी एक्सपाइरी डेट का भी  होना जरुरी है।

वर्जन
शहर में बिक रहे पानी के अनधिकृत पाउच पर नगर निगम और फूड डिपार्टमेंट कार्रवाई करता है। इस तरह के पाउच से पेट की कई बीमारियां होती है। जिसमें पीलिया, डायरिया और हेपेटाइटिस मुख्य है। इसके अलावा दूषित पानी के सावन से कई जल जनित बीमारियां होती है।:::::::डॉ. अशुतोष दुबे चिकित्सा अधीक्षक सिविल अस्पताल

2:::: जो लोग  मानकों के विपरीत पानी बेच रहे है उनके खिलाफ अ•िायान चलाकर कार्रवाई की जाती है जो लोग पानी को विपरीत मानकों के विरुद्व बेच रहे है उनके विरुद्व मुकदमा दर्ज करवाया जाता है। सिटी मजिस्ट्रेट एस एन यादव

#पानी #जल #बस #बिमारी #दूषित 

फिर से पीछे छूटता विकास का नारा


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति वैसे तो हमेशा से ही जातिवाद के आधार पर होती आई है मगर पिछल्ले दो तीन वर्षों से प्रदेश की राजनीति में काफी बदलाव देखे गये है जिसमें कई बार ऐसा लगा कि प्रदेश में राजनीति अब विकास के नाम पर होने लगी है। राजनैतिक पार्टियां जातिवाद और संप्रदायिकता की राजनीति से से ऊपर उठ गई है। मगर ये मात्र भ्रम  ही साबित हुआ। प्रदेश में अगामी 2017 के विधानसभा  चुनाव के आते ही प्रदेश में विकास का नारा कमजोर पड़ने लगा है। सभी  राजनैतिक पार्टी सत्ता की चाह में जातिवाद की राजनीति करने में लग गई है वो चाहे विपक्षी पार्टी हो या सत्ता की सिंहासन पर बैठी पार्टी हो। अगामी विधानसभा  चुनाव को जीतने के लिए सभी  पार्टियों ने अपने पत्ते खोलने शुरु कर दिये है उनके इन पत्तों में प्रदेश की विकास का नारा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।

2012 में शुरु हुआ था विकास का नारा

विधानसभा  चुनाव 2012 में सपा ने अखिलेश यादव को आगे कर युवा चेहरा और विकास का मुददा उठाया था। अखिलेश का युवा चेहरा और विकास की बात पर प्रदेश की जनता ने जातिवाद को किनारे कर सपा को जमकर वोट दिया जिसका नतीजा ये रहा कि समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ और प्रदेश में सपा की सरकार बनी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के विकास का मुददा उठाकर भाजपा  ने  2014 के लोकसभ  चुनाव में अप्रत्याशित तरीके से विजय प्राप्त की और दिल्ली में कांग्रेस का सफाया कर अपनी सरकार बनाई। इन दोनों सालों में जो राजनीति में बदलाव देखने को मिला  उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह जो थी वो विकास का नारा था। हालकि दोनो ही पार्टियों ने अभी  देश प्रदेश के विकास को लेकर काफी काम भी  किया है मगर अब प्रदेश में अगामी विधानसभा  चुनाव के करीब आते ही विकास का मुददा पीछे छूटता जा रहा है और जातिवाद की राजनीति हावी होती दिख रही है।

जातिवाद की राजनीति हूई शुरु
वैसे तो विकास का नारा आज भी  सरकार की तरफ से दिया जा रहा है और अगामी विधानसभा  चुनाव में यही विकास के नारे के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान भी  कर चुकी है मगर ऐसे में कोई भी  पार्टी किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती इसलिए पार्टियां विकास के नारे के साथ जातिवाद के जरिये भी  अपनी पैठ वनाने में लगी है। हाल ही में प्रदेश सरकार के कुछ फैसलों से ये साफ भी  हो गया है जैसे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ,लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और महाराणा प्रताप पर सार्वजनिक छुटटी घोषित कर जाति के आधार पर अपनी जमीन तैयार करनी शुरु कर दी है। इसके अलावा आरक्षण मुददा भी  उठा कर एक तरफ सपा बीएसपी के वोट बैंक पर निशाना साधने और भाजपा  को मुददाविहीन करने की हर संभव  कोशिश में लगी है। सपा द्वारा गौ हत्या, और एक विशेष समुदाय की पार्टी होने का विपक्षियों के लगातार निशाने पर रही है लेकिन सरकार ने गौ हत्या पर कड़ा कानून बनाकर और एक समाजवादी श्रवण यात्रा शुरु कर जातिवाद की राजनीति का शुभारम्भ  कर विपक्षियों को मुददा विहीन कर दिया।  इनसब फैसलों से ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाला विधानसभा  चुनाव विकास के नारे के बजाये जातिवाद के सहारे लड़ा जायेगा जैसाकि हमेशा होता आया है।


#विधानसभा #चुनाव २०१७ #सपा #भाजपा #बीजेपी #मोदी #अखिलेश #उत्तर परदेश 

Tuesday, 2 June 2015

मिली भगत से खुली शराब की दुकानें


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ।  शहर में दिन ब दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ती जा रही है। ज्यादातर घटनाएं शराब के सेवन करने के चलते हो रही हैं। इसके बावजूद शहर में शराब की दुकानों को उनके मानको के विपरीत खोला जा रहा है। आबकारी नियमों को ठेंगा दिखाते हुए शराब ठेकेदार अपनी दुकानें चला रहे हैं। शहर में ऐसी दर्जनों शराब की दुकानें है जो नियमों के विपरीत संचालित हो रही है। शराब और ठेके के आस-पास स्कूल और धार्मिक स्थलों की दूरी निर्धारित हैं। इसके बावजूद विभागीय अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर अंग्रेजी शराब की दुकान खुलवा दी है। कई जगह पर संचालित शराब की दुकान की दूरी स्कूल से 50 मीटर भी  नहीं है। इसके चलते आए दिन शराब के नशे में धुत लोगों की अ•ाद्र हरकतों से शिक्षकों के अलावा छात्राओं और राहगीरों को भी  दो-चार होना पड़ रहा है। ठेकेदार और आबकारी विभाग  के अधिकारी सांठ-गांठ कर नियमों के विरूद्ध दुकानें संचाालित कर रहे हैं। आबकारी वि•ााग के आलाधिकारी सुविधा शुल्क के बदले में नियमों का पालन करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
केस नम्बर एक
लालबाग गर्ल्स कॉलेज से लगभाग  40 मीटर की दूरी पर खुली शराब की दुकान छात्र-छात्राओं की परेशानी का सबब बनती जा रही है। लालबाग गर्ल्स कालेज की दीवार और मॉडल शॉप की दूरी 40 मीटर से भी  कम है। मॉडल शॉप के पीछे वाली गली में धार्मिक स्थल भी  है। इसके बावजूद वहां शराब बेची जा रही हैं। ऐसे में संबधित वि•ााग भी  आंखे मूंदे है। आपको बता दें कि आबकारी विभाग  द्वारा लालबाग स्थित इस मॉडल शॉप पर सिर्फ शराब बेचने का लाइसेंस दिया गया है। इसके बावजूद वहां पर शाम होते ही खुले आम जाम टकराये जाते लोगों को आसानी से देखा जाता है। कई बार स्थानीय लोगों ने भी  इसकी शिकायत की है मगर कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

  केस नम्बर दो
कपूरथला के पास शाही मस्जिद से मात्र 30 से 40 मीटर की दूरी पर ही मॉडल शॉप खोल दी गई है। खास बात यह है कि मॉडल शॉप के बगल में ही लेडीज टेलर की दुकान हैं। यहां पर कपड़े सिलवाने आने वाली महिलाओं से अक्सर छेड़खानी होती रहती है। दिन में तो लोग मॉडल शॉप के अंदर पीते है मगर शाम होते ही सड़क के किनारे ही महफिल जम जाती है। नमाज के समय नमाजियों को भी  काफी दिक्कत होती हैं। शहर में ऐसी कई जगह है जहां पर आबकारी मानकों के विपरीत मॉडल शॉप और अंग्रेजी शराब की दुकानों का संचालन हो रहा है।

छेड़खानी का शिकार होती है महिलाएं
गर्ल्स स्कूल के बगल में ही शराब की दुकान होने के कारण छात्राओं को रोज छेड़खानी जैसी घटनाओं से दो चार होना पड़ता है। स्कूल टाइम पर अक्सर छात्राओं पर फब्तियां कसी जाती है। इसके अलावा स्थानीय निवासियों को •ाी इस परेशानी का सामना करना पड़ता है। मोहल्ले की महिलाओं और लड़कियों को शाम के बाद निकलना ही दूभर हो जाता हैं। स्थानीय निवासी साऊद खान ने बताया कि कई बार इसको लेकर जिला आबकारी अधिकारी को ज्ञापन भी  दिया जा चुका है और संबधित थाने में शिकायत भी  की गई, मगर इसके बाद भी  कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि मोहल्ले की लड़कियों के साथ शराबी अक्सर छेड़खानी करते हैं जिसको लेकर कई बार झगड़ा भी  हो चुका है।

खुले आम टकराते हैं जाम

शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में शुमार लालबाग में शराबियों के हौंसले बुलंद हैं। मुख्य सड़क और गर्ल्स कालेज के बगल में खुली मॉडल शॉप पर शराब बेचने का नियम है, पिलाने का नहीं। इसके बावजूद शाम होते ही मॉडल शॉप के बाहर सड़क के किनारे गाड़ियों की लाइन लगनी शुरू हो जाती है। गाड़ियों की बोनट पर ही जाम बनाये जाते हैं। यह सब कुछ प्रशासन की आंखों के सामने होता है, फिर •ाी प्रशासन आंखें मूंदे हैं।
रसूख प्र•ााव के कारण नहीं होती कार्रवाई
यहां के निवासी सऊद खान के अनुसार, लालबाग स्थित अंग्रेजी शराब की दुकान प्र•ाावशाली व्यक्ति की है जिस कारण उस पर कार्रवाई नहीं हो रही हैं। यह सब प्र•ााव का ही खेल है कि कई बार शिकायत करने के बाद •ाी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

आखिर क्या है नियम...
आबकारी नियमों के अनुसार मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर एवं स्कूलों से शराब दुकान की दूरी 50 मीटर होना अनिवार्य है। 50 मीटर से कम दूरी होने पर शराब की दुकान खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

वर्जन
जो •ाी धार्मिक स्थल रजिस्टर्ड हैं, उनसे शराब की दुकानों की दूरी कम से कम 50 मीटर होनी चाहिए। मानकों के अनुसार, स्कूल के बगल में •ाी शराब के दुकानों की दूरी कम से कम 50 मीटर होनी चाहिए। यदि कहीं मानकों के विपरीत मॉडल शॉप और शराब की दुकानें चल रही हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी।

                                                जिला आबकारी अधिकारी, पीसी पाल
#शराब #अवैध #शराबी 

दलालों के कब्जे में आरटीओ कार्यालय



इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। परिवहन विभाग लाख दावे के बाद भी  दलालों पर कोई लगाम नहीं लगा पा रहा है। राजधानी में परिवहन विभाग  के अधिकारियों की मिलीभगत से दलाल लर्निंग और परमानेंट लाइसेंस की फीस से दस गुना ज्यादा पैसा वसूल रहे हैं। राजधानी के आरटीओ दफ्तर दलालों की गिरफ्त में हैं।
पैसा खर्च करें तुरंत होगा काम
चाहे आपको ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो, गाड़ी का रजिस्टेÑशन कराना हो या फिर सवारी गाड़ी का फिटनेस परमिट लेना हो, सारे काम हो जायेंगे और इसके लिए आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दलाल आरटीओ आॅफिस के इर्द गिर्द ही मिल जाएंगे। मगर, इसके लिए आपको मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी। वैसे तो लाइसेंस की सरकारी फीस 60 रुपये है, लेकिन दलाल इसके लिए 2300 रुपये वसूलते हैं। इसके एवज में आपको गाड़ी चलाकर ट्रायल नहीं देना पड़ेगा और आपका काम चुटकी में हो जायेगा। चपरासी से लेकर बड़े साहब तक इस गोरखधंधे में शामिल हैं।
ऐसे होता हैं खेल
परिवहन निगम द्वारा डाक से लाइसेंस को आवेदक के घर भेजे  जाने की सुविधा दी जा रही है। इस सुविधा के बाद अधिकारियों का दावा था कि दलालों पर लगाम लग सकती है। मगर, हकीकत यह है कि लाइसेंस तो जरूर डाक से पहुंच रहा है, लेकिन खेल सारा दलाल ही कर रहे हैं।
दरअसल, आवेदक को लर्निंग लाइसेंस बनवाने के लिए होने वाली लिखित परीक्षा में बाबू जानबूझ कर फेल कर देते हैं। इसके बाद शुरू होता है दलालों का खेल। लाइसेंस बनाने के लिए परेशान आवेदक दलालों के पास भागने  लगते हैं। ऐसे में दलाल दोबारा फार्म भरवा कर बिना किसी ट्रायल के लाइसेंस बनवा देता है। सुविधा और काम की गारंटी के चक्कर में आवेदक भी  सोचता है कि कौन झंझट में पड़े दलाल को पैसे दो और काम कराओ।
आवेदक से सीधे बात नहीं करते अधिकारी
ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए दलालों का खेल कोई आज का नहीं है। आम लोगों को लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया नहीं मालूम थी। उधर, आरटीओ दफ्तर के अधिकारी •ाी आवेदक से सीधे बात नहीं करते हैं। क्योंकि सीधे आवेदक से बात करने पर एक फूटी कौड़ी •ाी अधिकारी महोदय को नहीं मिलती है और दलाल से कमीशन तय रहता है। नतीजा यह है कि दलालों का जलवा कायम है।
मिलीभगत से होता है खेल
दलालों का बोलबाला ऐसे ही नहीं है उनको वहां पर बाबू और अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। चपरासी से लेकर अधिकारियों तक का हिसाब-किताब होता है और सबका हिस्सा लगता है। दलालों द्वारा जो काम करवाया जाता है उसकी रकम पहुंचा दी जाती है। अधिकारियों और दलालों के बीच में चपरासी माध्यम का काम करते हैं। कोई •ाी अधिकारी दलालों से सीधा पैसा नहीं लेता। दलालों के अनुसार 2300 रुपये में तीन सौ रुपये सरकारी फीस के नाम से चला जाता है। 1000 रुपये अधिकारी को और 100 रुपये चपरासी को देने पड़ते हैं। इसी तरह लर्निंग और परमानेंट लाइसेंस बनाने का कमीशन अलग-अलग चपरासी को दिया जाता हैं।

अंदर से लेकर बाहर तक जमावड़ा
आरटीओ के दफ्तर के बाहर और अंदर तक दलालों का राज है। बाहर बनी दुकानें और पेड़ की छाव में दलालों का काम चलता रहता है। दलाल को किसी का काम करवाना होता है तो वो दफ्तर के चपरासी को पैसा और फार्म दे देता है, वाकी काम चपरासी करवाता है। शाम को दफ्तर बंद होने के बाद हिसाब का लेन-देन होता है। अधिकारियों की शह पर दलालों के हौंसले बुलंद हंै।
सीसीटीवी कैमरे भी  नहीं लगा पाये लगाम
ट्रांसपोर्ट नगर दफ्तर में तो सीसीटीवी कैमरे लगा दिये गये हैं, लेकिन उसके बाद •ाी वहां पर दलालों पर लगाम नहीं लग सकी है। वहीं रहीमनगर दफ्तर में तो अ•ाी तक कैमरे •ाी नहीं लग पाये। इससे यहां पर दलालों का बोलबाला ज्यादा है। आरटीओ के दफ्तर के बाहर लगी चाय की दुकानें इनका मुख्य अड्डा हैं। लाख कोशिशों के बाद •ाी परिवहन वि•ााग दलालों पर लगाम लगाने में नाकाम है।


#दलाल #आरटीओ #परिवहन 

रंग भरने वाले हुए बे रंग


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लखनऊ। कहते है हाथ का हुनर कभी  बेकार नही जाता है मगर ये मुहावरा वर्तमान समय में पेंटरों पर सटीक नही बैठता। डिजिटल युग के फ्लैक्स, ग्लोसाइन बोर्ड , एलईडी बोर्ड के दौर में पेंटिग कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले कारीगरों को अब दो जून की रोटी भी  कमाने में लाले पड़ गये है। दीवारों और बोर्ड पर अपने हुनर और कुची से चित्रों में जान डाल देने वाले कलाकार वर्तमान में अपने भविष्य को लेकर चितिंत है।कभी  शहर में इन पेंटरों का बोलबाला होता था लेकिन आज के समय में इनकी हालत दयनीय है। जो पुराने पेंटर थे वही इस पेशे को अपनाये हुए है। पुश्तैनी रुप से चली आ रही है पेंटिग कला शहर में अतिम पडाव में है।
अब सुनसान है गली
हजरतगंज में लीला सिनेमा के बगल वाली गली कभी  पेंटरों के रंगों से गुलजार रहती थी। यहां पर पेंटिग करवाने वालों को अपनी बारी का घंटो इंतजार करना पड़ता था दिन रात पेंटरों को काम से फुर्सत नही मिलती थी। अब पेंटरों को ग्राहकों का इंतजार करना पड़ता है। इस गली को पेंटरों वाली गली के भी  नाम से जाना जाता है लेकिन अब इस गली में नाम के अनुरुप कुछ नही मिलता।

डिजिटल युग की मार
वर्तमान समय में लोग आधुनिकता के दौर से गुजर रहे है। इस आधुनिकता के दौर में जो पीछे छूट रहा है वो है पुराने समय से चली आ रही प्रचलित कलात्मक शैली। कला को दीवारो पर उकेर कर उनमें कूची और बू्रसों के सहारे जान डाल देने वाले पेंटरों की रोजी रोटी  कम्प्यूटरीकरण के आने से छीन गई है। फ्लैक्स और ग्लोसाइन बोर्ड पेंटिग के मुकाबले कम खर्चीला है और जल्दी हो जाता है।


दस सालों में आया बदलाव 

सन 2005 के बाद डिजिटल युग ने तेजी से जगह बनाई है। इसमें किलियरटी और समय की बचत होने के कारण लोगों ने इसमें ज्यादा रुचि दिखाई है। इन दस सालों में पेंटर अपने जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे है। उनका वर्तमान हशिये पर है ऐसे में भविष्य में अपने बच्चों  को इस काम में लाने के बजाय वो कोई दूसरा काम करवाने को मजबूर है।
अब तो घर चलाना भी  मुश्किल
दस साल पहले पेंटर प्रतिदिन आठ सौ से एक हजार रुपये तक कमाते थे मगर आज दो सौ रुपये भी कमाने में लाले पड़ जाते है।  ऐसे में बच्चों की पढ़ाई तो दूर की बात घर का ही खर्चा नही चल पा रहा है। पहले पेंटिग करवाने के लिए लोगों की लाइन लगती थी अब दिन भर  बैठने के बाद भी  कभी  कभी  ऐसा होता है कि एक भी  ग्राहक नही आता।

कई लोगों ने बंद कर दिया काम
पेंटरों के कामों में गिरावट और कोई भविष्य न होने के कारण कई लोगों ने तो पेंटर का पेशा ही छोड़ दिया। रवि जो कभी  सबसे अच्छा और बेहतरीन पेंटर हुआ करता था मगर आज के समय में वो स्कूल में काम कर रहा है। वहीं सरवन जो कभी  पेंटर हुआ करते थे मगर आज क्लब लाइन पर वो चाय की दुकान लगाकर घर चला रहे है।

वर्जन:::::::
1... लीला सिनेमा वाली गली में पेंटरों की दुकानें लाइन से हुआ करती थी मगर आज एक दुक्का लोगों की ही दुकानें बची है। इस गली की रौनक ही पेंटरों से थी मगर वक्त के साथ सब बदल गया बस हम पेंटरों के हालात और बिगड़ गये। .......... सुरेंद्र पेंटर

2.....मैंने पेंटिग करने का काम जब शुरु किया था तब तो बहुत मजा आता था और काम भी  खूब रहता था। क•ाी सपने में भी  नही सोचा था कि आने वाले समय में काम की इतनी परेशानी होगी कि घर चलाना •ाी मुश्किल हो जायेगा। अब इस उम्र में कोई दूसरा काम भी  तो नही कर सकते बस जैसे तैसे जिंदगी काट रहे है। .......सुंदर पेंटर

3.....शहर के किसी भी  कोने में चला जाते तो एक न एक पेंटर मिल ही जाता था लेकिन अब ढूढ़ने पर भी  पेंटर नही मिलते। मैंने भी  पेंटिग से ही शुरुवात की थी मगर बक्त के साथ सब बदलना पड़ा नही तो बच्चों कीी पढ़ाई और घर चलाना भी  मुश्किल हो जाता। मैंने अब पेंटिग के साथ ग्लोसाइन और फ्लैक्स का भी  काम शुरु कर दिया। जिससे खर्चा निकल रहा है।...दिनेश पेंटर


#पेंटर #रंगशाल #गरीबी #बेहाल #लखनऊ

सरकारी तंत्र में पिसते पटरी दुकानदार


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। दिन रात मेहनत करके अपने और परिवार के लिए दो जून रोटी का इंतजाम करने वाले पटरी दुकानदारों की हालत मौजूदा समय में काफी दयनीय है। नगर निगम की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना रवेयै के चलते उनका रोजगार बंद  होने के कगार पर है। ऐसे में उनके पास पेट भरने के भी  लाले पड़ जायेंगे। एक तरफ नगर निगम शहर को यातायात सुगम तरीके से चलाने के लिए अवैध रुप से कब्जा किये सड़कों से व्यापारियों को हटाने में लगा है तो वहीं दूसरी तरफ वह कोर्ट के आदेश के बाद भी  पटरी दुकानदारों का लाइसेंसीकरण तो दूर की बात, सर्वे भी  नहीं करवा पाया है। अतिक्रमण के खिलाफ नगर निगम द्वारा आए दिन अभियान चलाता रहा है मगर उनके इस अभियान का सबसे ज्यादा नुकसान पटरी दुकानदारों को होता है।

कोर्ट के आदेश को भी  नहीं मानता विभाग 
कोर्ट का आदेश था कि पटरी दुकानदारों को जल्द से जल्द लाइसेंस देकर उनके लिए जिम्मेदार विभाग  एक स्थायी जगह तलाश करें मगर लाइसेंस देने की बात तो दूर अभी  तक पूर्ण रुप से सर्वे भी नहीं किये जा सके हैं। विभाग  ने 2014 में कमेटी बना कर सर्वे कराने की बात कही थी मगर दो साल बीत जाने के बाद भी  सर्वे पूरा नहीं हो सका है जबकि कोर्ट ने छह महीने में सर्वे करवाकर लाइसेंस देने की बात कही थी। उसके बाद भी  एक साल गुजर गया मगर पटरी दुकानदारों को लाइसेंस नहीं दिया गया है।

सर्वे कराने के फायदे
सर्वे  द्वारा नगर निगम को यह जानकारी हो जाती है कि शहर में कितने पटरी दुकानदार हैं, जिससे उनके लिए स्थाई रुप से जगह देने के लिए जमीन तलाश करने में विभाग  को भी  आसानी होती मगर सर्वे अभी  तक पूरी तरह से नहीं करवाये गये हैें जिससे नगर निगम को सही से अंदाजा भी  नहीं लग पा रहा है कि उनको कितने पटरी दुकानदारों को स्थाई रुप से जगह देनी है। विभाग  की लापरवाही पटरी दुकानदारों को अक्सर भारी पड़ती रहती है।

अतिक्रमण अभियान  से पटरी दुकानदारों को नुकसान
जब-जब नगर निगम द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जाता है तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान पटरी दुकानदारों को उठाना पड़ता है। अभियान  के दौरान सड़क पर कोई भी  पटरी दुकानदार दुकान नहीं लगा पाता है जिस कारण उसको आर्थिक तंगी से गुÞजरना पड़ता है। अभियान के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान फल विक्रेताओं का होता है। लंबी अवधि या हफ्ते भर  तक यदि उनको दुकान लगाने को नहीं मिलता है तो फल खराब हो जाते हैं जिससे उनके मुनाफे की बात तो दूर, लगी पूंजी भी  वसूल नहीं हो पाती है। दुकानदारों के मुताबिक, अ•िायान के समय जब दुकान लगाने को नहीं मिलता तो घर में खाने के भी  लाले पड़ जाते हैं।

ये होगा फायदा
यातायात व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिए जरुरी है कि पटरी दुकानदारों को स्थाई जगह मुहैया करवाई जाये। यदि नगर निगम द्वारा इन पटरी दुकानदारों को लाइसेंस देकर वैध तरीके से जमीन उपलब्ध करवाती है तो इससे यातायात की समस्या अपने आप ही खत्म हो जायेगी। इसके अलावा जाम जैसी समस्या से लोगों को निजात मिल जायेगी। पटरी दुकानदारों को भी  फायदा होगा क्योंकि उनका इंश्योरेंस किया जायेगा ऐसे में यदि कोई हादसा होता है तो उनको नुकसान का पैसा भी  मिलेगा। इसके अलावा आये दिन पटरी दुकानदारों द्वारा धोखाधड़ी के केस भी  सामने आते रहते हैं। लाइसेंस मिलने से इस पर •ाी काफी हद तक अंकुश लग जायेगा क्योंकि उनको विभाग  द्वारा पहचान पत्र दिया जायेगा।

इन मुकदमों में कटता है चालान
अवैध रुप से दुकान लगाने वाले पटरी दुकानदारों को आये दिन किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ता है। 26 क के तहत चालान काटने पर उनको 5000 हजार रुपये जुर्माना देना पड़ता है। इसके साथ ही वारंट आने पर जेल भी  जाना पड़ सकता है। फेरी नीति चालान नहीं करना चाहिए मगर जानकारी कम होने के कारण कर देते है। वैसे बहुत हुआ तो 34 बी के तहत चालान कर सकते है।

यहां पर है ज्यादा पटरी दुकानदार
वैसे तो पटरी दुकानदार पूरे शहर में है, मगर सबसे ज्यादा पटरी दुकानदार अमीनाबाद, नक्खास, आलमबाग, चौक व निशातगंज में है। अकेले अमीनाबाद में ही लगभग  700 पटरी दुकानदार है। इसके अलावा इतनी ही संख्या में आलमबाग व नक्खास में भी  पटरी दुकानदार है। 

वर्जन::::::::::::::

1::: हाशिम जो अमीनाबाद में पटरी पर दुकान लगाते है उन्होने बताया कि नगर निगम अक्सर अ•िायान चलाती है जिससे हम लोगों को काफी नुकसान होता है अभी  तक हम लोगों को लाइसेंस नहीं दिया गया है। वि•ााग की लापरवाही का नतीजा हम लोगों को भूगतना पड़ रहा है।

2::: शहजाद जो अमीनाबाद के मुख्य चौराहे पर दुकान लगाते है उनके अनुसार विभाग  उनका के खिलाफ करवाई नही करता जो पक्की दुकानों में अवैध रुप से निर्माण करवाये हुए है। हम लोगों पर दोहरी मार पड़ती है हम न तो इधर के रहते है न उधर के। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान हम पटरी दुकानदारों का ही होता है।

3:::::मनीष चौधरी जो पटरी दुकानदारों के अध्यक्ष है उनसे बात करने पर उन्होने बताया कि जो सर्वे नगर निगम द्वारा करवाये गये है उनकी लिस्ट अभी  तक नहीं दी गई है जिससे ये ज्ञात नहीं हो पा रहा है कि कितने दुकानदारों को सर्वे में शामिल किया है। नगर निगम के पास मोहन मार्केट और गड़बड़ झाला ही है जिसमें वो निर्माण करवा के हम लोगों को दे सकेगा। पटरी दुकानदार तो बनने में जो लागत लगेगी वो •ाी देने को तैयार है मगर नगर निगम ही हीलावाही कर रहा है। 

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