Monday, 22 June 2015

विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रहे दल


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। देश प्रदेश के  विकास के लिए जितनी अहमियत सत्ता पक्ष की होती है उतनी ही अहमियत विपक्ष की भी  होती है। यदि विपक्ष मजबूत नहीं होगा तो सरकारें भी  काम नहीं कर पाती। विपक्ष में रहते हुए भी  पार्टियां प्रदेश के विकास में अहम •ाूमिका निभाति  है। विपक्ष की भूमिका हमेशा ही रचनात्मक होती है। व प्रदेश के लिए सकारात्मक होती है। लोकतंत्र के लिए सरकार के साथ विपक्ष का भी  होना उतना ही जरुरी है जिस तरह हर कार्य के लिए सरकार की जवाबदेही बनती है वैसे ही विपक्ष की भी भूमिका  होती है कि वो सरकार के कार्यों पर नजर रखे।

सरकार के कार्यों पर नजर रखना विपक्ष का काम
विपक्ष का काम होता है कि सरकार द्वारा जो कार्य करवाये जा रहे है वो जनहित में है कि नहीं इस पर नजर रखना। कई बार सरकार द्वारा ऐसा कार्य भी  किया जाता है जो पूर्ण रुप से  जनता के हितों के अनुरूप नहीं होता। ऐसे में विपक्ष द्वारा चुप रह जाना एक तरह से सरकार का मौन समर्थन करना होता है। यहीं  से शुरु हाती है विपक्ष की भूमिका   क्योंकि सरकार के किसी भी  गलत निर्णय का विरोध करना उनका नैतिक कर्तव्य है। विपक्ष का काम सरकार को ऐसा करने से रोकना जो जनता के हित में अनुकूल न हो कई बार सरकार अपना अड़ियल रूख छोड़ने को तैयार न हो तो विपक्ष सदन के भीतर और बाहर अपना विरोध प्रकट कर सकता है। विपक्ष को यह अधिकार है कि अगर सरकार जनहित की भावनाओं को अनदेखी करते हुए कोई नीतिगत फैसला लेती है तो वह सदन में सरकार से उस पर बहस की मांग कर सकता है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर सरकार को रोकने के लिये सदन के भीतर कार्य-स्थगन प्रस्ताव ला सकता है।

इसके अलावा लोकतांत्रिक तरीके से जन-जागरुकता अभियान चलाकर आम जनता को सरकार की सच्चाई बताकर उसे सरकार के विरुद्व खड़ा कर सकता है। विपक्ष चाहे तो धरना, प्रदर्शन, घेराव आदि के माध्यम से सरकार के विरुध्द जन-आंदोलन चला सकता है। इस तरह से वह सरकार को अपना जन-विरोधी निर्णय वापस लेने के लिये मजबूर कर सकता है।

प्रदेश में विपक्ष की स्थिति नाम मात्र
प्रदेश में मौजूदा सपा सरकार पूर्ण बहुमत में है जिस कारण वो फैसले लेने के लिए बाध्य नहीं है। प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी बहुजन समाज पार्टी विपक्ष की भूमिका मिका में बिल्कुल भी  नजर नहीं आ रही है।  2012 के विधानसभा  चुनाव में करारी शिकस्त पाने के बाद से बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती तो जैसे गायब ही हो गई इसके अलावाप्रदेश की तीसरे और चौथे नंबर पर रही कांग्रेस और •ााजपा की पार्टियों ने कुछ हद तक विपक्ष की भूमिका निभाने  की कोशिश की मगर वो भी  पूर्ण रुप से विपक्ष की भूमिका  निभा  नहीं पाया। यही कारण है कि प्रदेश में बढ़ रहे क्राइम पर  सरकार पर कोई दबाव नहीं दिख रहा है क्योकि प्रदेश कि मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा ने विपक्ष की भूमिका ही नहीं निभाई  जिससे प्रदेश सरकार पर कोई दबाव नहीं बना। इसके अलावा कई मुददों पर विपक्षी दल •ााजपा और कांग्रेस ने सरकार पर करारे वार किये मगर उनको जमीन पर उतारने पर जनता के बीच लाने में असफल रहे।
मुददे कई पर नहीं हुआ विरोध
पीसीएस परीक्षा का पेपर लीक, बिगड़ती कानून व्यवस्था हो, संप्रदायिक दंगे हो, सरे आम मर्डर हो, लूट हो, पत्रकार को मंत्री के खिलाफ लिखने पर जलाकर मार डालने वाली घटना हो, बेलगाम मंत्रियों के ऊपर लग रहे आरोपों पर •ााजपा कांग्रेस ने जुबानी जंग तो शुरु की मगर उसको जमीन पर नहीं उतार पाये जिसके कारण कुछ समय बाद ये सब मुददे बंद हो गये ।अभी  हाल में ही पत्रकार को जिंदा जलाकर मार डाला गया जिसमें सरकार के मंत्री का नाम शमिल है इसके बावजूद विपक्षी पार्टियों ने बयान जारी कर विरोध प्रकट किया बल्कि ये एक ऐसा मुददा है जिसमें सरकार को घेरा जाये तो होने वाले चुनाव में सरकार को नुकसान और विपक्ष को फायदा मिल सकता है। तीन साल में सरकार के विरुद्व कोई भी  बड़ा आंदोलन नहीं किया गया। पेपरबाजी ओर बयानबाजी तो खूब हुई।
इस वक्त प्रदेश में सरकार के विरुद्व सबसे बड़ी पार्टी के रुप में •ााजपा उभर  के सामने आ रही है । लोकसभा के चुनाव के बाद भाजपा  के दिन बदल गये जनता में एक बार फिर इस पार्टी में विश्वास जाग उठा हुआ है। अपने तीखे तेवर से दिल्ली का सिंहासन हासिल करने के बाद प्रदेश में पार्टी की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन पार्टी प्रदेश सरकार के खिलाफ उस स्तर पर विरोध कर विपक्ष की भूमिका  नहीं निभा  रही जो उसको निभाना  चाहिए। पार्टी के ऊपर से लोकसभा  चुनाव की जीत की खुमारी उतरने का नाम ही नही ले रही है। ऐसे में वो प्रदेश सरकार का विरोध करे भी  तो कैसे। इसी तरह कांग्रेस का भी  हाल है फिलहाल तो कांग्रेस अभी  अपनी जमीन तैयार करने में लगे है। लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए काफी मायने रखते है। प्रदेश की जनता में सरकार द्वारा कराये गये विकास कार्यों का बखान किया जा रहा है जिसको जनता जान भी  रही है। मगर प्रदेश में बिगडती कानून व्यवस्था और सरकार के भ्रष्ट  मत्री व कानून को ताक पर रखने वाले नेताओं की भी  चर्चा कुछ दिन जो होती है मगर फिर वो  खत्म हो जाती है। वजह विपक्ष का अपना काम ढंग से न नि•ााना है। विपक्ष का मजबूत होना इस बात का प्रमाण होता है कि प्रदेश में जंगलराज या एकाधिकार नहीं हो सकता।
#सपा #विपक्ष #बसपा #प्रदेश #भाजपा 

Wednesday, 17 June 2015

पंचायत चुनाव की बिछने लगी बिसात


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही ग्राम पंचायतो में संभावित  प्रत्याशियों ने अपना प्रचार शुरु कर दिया है। पंचायत चुनावों का औपचारिक एलान भले ही अभी  न हुआ हो, लेकिन चुनावी बिसात पर वोटो की मोहरे बिछने लगी है। पंचायत के ग्राम प्रधान किसी भी  हाल में बचे कार्यकाल के लिए मन मुताबिक काम करवा कर लोगों के बीच फिर से विकास का नारा देने की तैयारी में लगे हुए है। वहीं दूसरी तरफ पुराने प्रधान प्रत्याशी अपना रुतबा कायम करने के लिए मौजूदा प्रधान पर आरोप पर आरोप लगाकर उनके वोट बेंक में सेंध मारने की तैयारी कर रहे है। आलम ये है कि पंचायत चुनाव में वो स•ाी हथकंडे अपने जा रहे जो देश और प्रदेश के सेंट्रल हॉल में पहुॅचने के लिए होते है। साम दाम दंड भेद का ऐसा चक्रव्यूह रचा जाता है कि सामने वाला समर्पण के अलावा किसी काम का नहीं रहता कुछ ऐसा ही राजधानी समेत ग्रामीण इलाकों में होने लगा है। शाह और मात का खेल इतना बुरा है कि लोग खून बहाने से भी  नहीं चूकते। ग्राम पंचायत के चुनाव अपनाये जाने वाले रणनीति पर प्रकाश डालती एक रिपोर्ट

हाल की कुछ घटनाएं
पंचायत चुनाव हलाकि अक्टूबर या सितबर में होने है मगर उनको लेकर संभावित प्रत्याशियों ने अभी  से तैयारियां तेज कर दी गई है। इसके लिए वो साम दाम दंड भेद वाली नीति का पालन कर रहे है। हाल ही की कुछ घटनाओं ने ये साबित कर दिया है कि इसबार चुनाव सिर्फ पैसे या व्यक्तिगत रुप से नहीं लड़ा जाने वाला है। इस बार के चुनाव में पिछल्ले बार के चुनाव से ज्यादा केस और खून खराबा होने वाला है।
केस एक- अभी  हाल ही में कुछ दिन पहले अमेठी में प्रधान ने अवैध कब्जे से रोका तो दूसरे पक्ष ने उसको जमकर पीटा और लहूलुहान कर दिया। इसमें आरोपी प्रधान पद का संभावित उम्मीदवार है। इसलिए इस घटना को पंचायत चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है जो काफी हद तक सही भी  है।
केस दो- उन्नाव क्षेत्र में प्रधानी चुनाव की पुरानी रंजिश के चलते विरोधी पार्टी ने 7 से 8 साल के बच्चों पर गैंगरेप का आरोप लगा दिया। यहीं नहीं उनके खिलाफ एफआईआर भी  दर्ज हो गई।

केस तीन- बेंती गांव में पूर्व प्रधान ने मौजूदा प्रधान पर विकास कार्य के लिए आये पैसे में 8 लाख रुपये के गबन का आरोप लगाया है। पूर्व प्रधान ने इसकी शिकायत जिला प्रशासन से भी  की है जिसकी जांच चल रही है।


शुरु हुई खेमेबाजी
पंचायत चुनाव के त्रिस्तरीय चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही  प्रत्याशियों ने होर्ल्डिंग्स और बैनर के माध्यम से प्रचार शुरु कर दिया है। इसके साथ ही घर घर जाकर संपर्क भी  शुरु कर दिया है। अपनी दावेदारी को मजबूत करने के चौपाल लगनी भी  शुरु हो गई है शाम होते ही सं•ाावित प्रत्याशियों के घरो के आगे जमावड़ा बताता है कि पंचायत चुनाव की तैयारियां अभी  से शुरु हो गई है।
पैसे का जमकर हो रहा है इस्तेमाल
पंचायत चुनाव में पिछल्ली बार एक प्रत्याशी पर कम से कम बीस लाख रुपये का खर्चा बैठा था इस बार के पंचायत चुनाव के माहौल को देखते हुए ये खर्चा बढ़ कर चालीस लाख तक जा सकता है। इतने पैसे में तो विधायकी के  चुनाव लड़े जाते है। मगर वर्तमान समय में पंचायत के चुनाव में इतना पैसा खर्च हो रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायती चुनाव में कितना फायदा होता है। लोग चुनाव के लिए अपनी जमीने तक बेंच रह े है।

शुरु हुई उठा पटक
पंचायती चुनाव के नजदीक आते ही पंचायती क्षेत्रो में एक बार फिर पुरानी रंजिशे पनापने लगी है। पुराने प्रत्यशियों ने मौजूद प्रधान पर घोटालों का आरोप लगा कर उनको कानूनी दांव पेज में उलझाना शुरु कर दिया है। इसके साथ एक दूसरे के समर्थकों पर फर्जी मुकदमें करवाकर उनको जेल तक भेजने की तैयारी होने लगी है। इस लड़ाई का सीधा सा मकसद है कि अपनी ताकत का एहसास करवाना। अपनी ताकत के जरिये चुनाव लड़ने वाले लोग खून खराबा करने में •ाी पीछे नहीं हटते है। चुनाव के नजदीक आते ही गांवों में प्रत्याशियों ने अपने गुट को मजबूत करना शुरु कर दिया है। विधान स•ाा चुनाव की तर्ज पर ही यहां पर भी  अपने विरोधियों को फर्जी केस में फंसाकर उनको चुनाव लडने से वंचित करने की योजना पर काम हो रहा है जिसमें पैसे के साथ पुलिस •ाी बखूबी साथ दे रही है।

राजनैतिक पार्टियों का प्रत्याशियों को संरक्षण
इन चुनावों पर पार्टियों का द्वारा प्रत्याशियों को संरक्षण दिया जाता है क्योकि बड़े चुनावों में निर्वाचित  ग्राम प्रधान जिला पंचायत सदस्यों की बड़ी भूमका होती है। जिसको लेकर पार्टियां गं•ाीर हो चली है। उनकी पार्टी को विधान सभा  और लोकसभ  के चुनावों में वोट मिल सके। ऐसे में बड़ी पार्टियों के लिए जमीन तैयार करने का काम ये चुनाव करते है।

वर्जन
प्रधानी के चुनाव को लेकर तनाव की बात सामनेआयी है। किसी भी दशा में फर्जी मुकदमें दर्ज नही किये जायेंगे। सभी  थानों को इसके लिये निर्देशित कर दिया गया है। सभी  मामलों में पुलिस को जांच के बाद कार्यवाही करने के कहा गया है। डीआईजी आर के चतुर्वेदी

#पंचायत #चुनाव #बिसात #गाँव 

Monday, 15 June 2015

पंचायती चुनाव की सुगबुगाहट बदलने लगी गावो की फिजा


जीस्ट
इस समय पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट मात्र से ही गांवो और पंचायती चुनावी क्षेत्र की फिजा बदल गई है। अब सुबह से लेकर शाम तक चौपाल लगने लगी है साथ ही शाम को मिलने वाली दवा भी  सुबह से मिलने लगी है। इससे इतर प्रत्याशी अपनी जीत के लिए सभी  समीकरण को बनाने में लगे हुए है। प्रधानी का लालच कहे या रुतबे का जलवा कि भाई भाई  के खिलाफ है बाप बेटे के खिलाफ है। इस चुनाव में गांव की तस्वीर बदलने की बात कहके लोग अपने जीतने के लिए हर वो हथकंडा अपना रहे है जो बड़े बड़े चुनाव में अपनाया जाता है। पैसे से लेकर जाति बिरादरी धर्म तक की राजनीति करने में लोग पीछे नहीं हट रहे है। इससे गांव के विकास के लिए होने वाले पंचायत  चुनाव अपना मूल रूप से भटक  चुके है। प्रदेश में पंचायत चुनाव अब पैसे और बंदूक के नोंंक पर होने लगे है जिससे गांव की ही नहीं बल्कि देश की भी  चुनावी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। खर्च के मामले में विधायकी के चुनाव भी  फेल है।



इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। पंचायती चुनाव भारतीय राजनीति की पहली और महत्वपूर्ण सीढ़ी है। देश की राजनीति की शुरुवात ही पंचायती चुनाव से होती है। आजादी के बाद से शुरु हुए पंचायती चुनाव में पहले की अपेक्षा आज के दौर में काफी बदलाव आ गये है। राजनीति की नींव ही अब काफी हद तक कमजोर हो गई है। इन चुनावों में भी  अब साम दाम दंड का उपयोग होने लगा है। वर्चस्व और प्रधानी रंजिश के चलते गांव की गलियां खून के रंग में रंग जाती है। पैसे के साथ खून का भी  बहना अब आम हो गया है। पिछल्ले वर्ष चुनाव में पैसा का बोलबाला था इस बार का भी  पंचायत चुनाव रुपये और बंदूक के दम पर होता नजर आ रहा है। पंचायत चुनाव के होने में अ•ाी तीन से चार महीने बाकी है। प्रशासन की तैयारी अभी  पूरी नहीं हुई है मगर प्रधानी का चुनाव लड़ने वाले लोगों ने अपनी पूरी तैयारी कर ली है। परियीमन से लेकर वोटो के वर्गीकरण तक में सभी  प्रत्याशी अपनी जीत को सुनिश्चित करने में लगे हुए है। इसबार के चुनाव में पैसा बोलता है कि तर्ज पर होने जा रहा है। प्रशासन इसको रोकने में कितना सफल होगा ये तो वक्त ही बतायेगा।

होर्ल्डिंग्स के जरिये शुरु हुआ प्रचार
एमएलए और एमपी की तर्ज पर प्रधान प्रत्याशियों ने भी  होर्ल्डिंग्स के जरिये अपना प्रचार प्रसार शुरु कर दिया है। अपने मनपसंद नेता की तस्वीर के साथ अपनी तस्वीर लगाकर अपना रुतबा दिखाने में ये प्रधान प्रत्याशी •ाी पीछे नहीं है। होर्ल्डिंग्स पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में प्रधान प्रत्याशियों ने अपने घोषणा पत्र भी  बनवाने शुरु कर दिये है जिसमें पंचायती क्षेत्र की प्रमुख समस्या का अंकित किया जा रहा है।

परिसीमन को लेकर मंत्रियो और नेताओं ने शुरु की जोर आजमाइश
आजादी के बाद देश में जब पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई, तब गांधी के ग्राम्य स्वराज्य को पूर्ण करने का सपना था। तब यह सोचा भी  नहीं गया था कि पंचायतें इस तरह कलह का अड्डा बनेंगी, गांव के गांव विभजित होंगे। अब तो खेती बेचकर चुनाव लड़े जा रहे हैं। पहले पंचायत के चुनाव में गांव इकट्ठा होता था, हाथ उठाकर वोट करता था और प्रधान चुन लिया जाता था। गांव में ही न्याय पंचायतें छोटे-मोटे विवाद सुलझा देती थीं। अब न्याय पंचायतें समाप्त हो चुकी हैं। पंचायत चुनाव में इस बात पर जोर आजमाइश हो रही है कि पंचायतों को कैसे आरक्षित कराया जाए या आरक्षित होने से बचाया जाए। इसके लिए विधायक से लेकर मंत्री तक तैयार बैठे हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ को सामने रख कर पंचायतों का परिसीमन कराते रहे हैं। यही कारण है कि 20 साल में पंचायतों के परिसीमन पर कोई एक नीति नहीं बन पाई।
जुआ की तरह है पंचायत चुनाव
लोग का मानना था कि प्रधान बनकर लोगों की सेवा की जाती थी मगर वर्तमान समय में ऐसा बिलकुल नही है पानी की तरह पैसा बहाने का मतलब है कि कि वो समाज सेवा नही बल्कि चुनाव जीत कर उस पैसे को ब्याज समेत वसूल करना है। सरकारी योजनाओ का अपने हित के लिए इस्तेमाल करके उसका फायदा उठाते है। इसके अलावा शहर से लगे गांव के जमीन के रेट वर्तमान समय में आसमान छू रहे है जिससे प्रधान ग्राम समाज की जमीन का सौदा प्रापट्री डीलरो से करके मोटा पैसा वसूलते है। इसके साथ ही जो रुतबा होता है सो अलग।
योजनाओं में पारदर्शिता की कमी से बढ़ा भ्रष्टाचार
सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की कमी से •ा्रष्टाचार ज्यादा बढ़ गया है। सरकारी योजनाएं जैसे मनरेगा, मिड डे मिल जनता के लिए कम, प्रधानों और कुछ अफसरों के लिए कामधेनु साबित हुई है। मिड-डे मील के •ाुगतान में  स्कूल के प्रधानाध्यापक और प्रधान के हस्ताक्षर होते हैं। इन दोनों की मिली •ागत से बच्चो को मिलने वाला खाना या तो इनके घर पहुंच जाता है या बाजार में बिक जाता है। इसके अलावा इंदिरा आवास को लेकर लेन-देन हो रहा है। पंचायते यानी छोटी सरकारों को प्रशासनिक दर से मजबूत नहीं किया गया, लेकिन योजनाओं में आने वाला पैसा स•ाी को दिख रहा है।
चुनाव में खर्च हो जाते है लाखो रुपये
पंचायत चुनाव में पिछल्ली बार एक प्रत्याशी पर कम से कम बीस लाख रुपये का खर्चा बैठा था इस बार के पंचायत चुनाव के माहौल को देखते हुए ये खर्चा बढ़ कर चालीस लाख तक जा सकता है। इतने पैसे में तो विधायकी के  चुनाव लड़े जाते है। मगर वर्तमान समय में पंचायत के चुनाव में इतना पैसा खर्च हो रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायती चुनाव में कितना फायदा होता है। लोग चुनाव के लिए अपनी जमीने तक बेंच रह े है।

परिवार के हिसाब से दिया जाता है पैसा
ग्राम पंचायत चुनाव में जब नोटो के जरिये वोट खरीदने का दौर शुरु होता है तो उसमें परिवार में मौजूद लोगों की संख्या के आधार पर पैसे दिये जाते है जितना बड़ा परिवार उतनी ही मोटी रकम दी जाती है। पिछल्ली बार बड़े परिवार के मुखिया को तीन हजार रुपये तक का एक आदमी के वोट की कीमत दी गई थी। इसबार ये पैसा पांच हजार रुपसे प्रति व्यक्ति तक जा सकता है। इसके साथ ही पैसे पर बिकने वाले वोट पांच सौ रुपये से लेकर पांच हजार तक बिकते है। ये पैसा वोट पड़ने सुबह वाली रत से पहले दिया जाता है।

आकंडे
प्रदेश में ग्राम पंचायतो की संख्या 51914 है जिसमें ग्राम पंचायत वार्ड 652773 है यहां पर कुल मतदाता 113728542 है जिसमें पुरुष 63360787 व महिलाएं 50367755 है। इसके अलावा राजधानी में ग्राम पंचायतो की संख्या 498 है ग्राम पंचायत वार्डों की संख्या 6306 है। राजधानी में कुल मतदाता 1018501 है जिसमें पुरुष मतदाता 539929 है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 478572 है।
#पंचायत चुनाव #पैसा #

छवि साफ करने की कवायद में पलीता लगाते मंत्री



इन्टरवल  एक्सप्रेस
लखनऊ। सत्ता का नशा कहे या पद का अहंकार ,तमाम नसीहतोें  के बाद भी  समाजवादी पार्टी के नेता और मंत्री सुधरने का नही ले रहे है। आलम ये है कि सपा सरकार के मंत्री और नेता खुद को कानून और सरकार से ऊपर समझने लगे है। नेता अपने सत्ता के  मद में ऐसा चूर है कि समाजवाद का मतलब तक •ाूल गये है। कई बार मुख्यमंत्री व सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव  की चेतावनी का असर देखने को नहीं मिल रहा है। जिससे सपा की न सिर्फसाख पर बटटा लग रहा बाल्कि सरकार की विकास वाली छवि धूमिल करने का काम हो रहा है। जिसका परिणाम ये है कि विरोधियों कोभी  सरकार को घेरने का बैठे बैठाये मौका मिल रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर  पहले से ही सरकार चिंतित है वही कानून तोड़ने पर आमदा  इन मंत्रियों  ने इसको सच साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी है।

विकास पर भारी पड़ते मंत्रियों के कारनामे
एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रदेश के विकास की बात कर रहे है  वहीं उनके मंत्री इस विकास को विनाश में बदलने में लगे हुए है। जिसके चलते मुख्यमंत्री की छवि के साथ सरकार का भी  दामन दागदार हो रहा है। मेट्रो परियोजना, महिला सुरक्षा, आईटी हब जैसी प्रदेश की तरक्की के लिए बनी योजनाओं का प्रचार प्रसार न हो पा रहा हो लेकिन मंत्रियों की कारगुजारी पूरे प्रदेश में गूंज रही है। कई बार हिदायत देने के बावजूद मंत्री सुधरने का नाम नहीं ले रहे है। उनके कारनामे भी  ऐसे है कि जिसमेें विकास का मुददा दब जा है और सरकार को चारों तरफ से आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है।

मंत्रियों के कारनामें
हाल ही में पिछड़ा वर्ग राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा पर हत्या का आरोप लगा है पत्रकार जोगेंद्र को पुलिस वालों ने घर में घुसकर पत्नी के सामने मिटटी का तेल डालकर इस लिए फूंक दिया क्योकि  पत्रकार ने फेसबुक पर मंत्री के कारनामों का खुलासा कर दिया था। पत्रकार का पोस्ट एक मंत्री को नगवार गुजरा कि उन्होंने उसकी जान लेली।
2:: राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त कैलाश चौरासिया पर एक आरटीओ से मारपीट और रंगदारी मांगने का एक ताजा मामला सामने आया है। आरोप है कि मिर्जापुर के आरटीओ चुन्नी लाल को न सिर्फ अपने घोष बस इतना था कि हाई कोर्ट के आदेश पर बाबू को ज्वाइनिग दे दी थी जिससे खफा मंत्री जी अपने पद प्रतिष्ठा को •ाूल मारपीट पर उतर आये। क्ेलाश चौरासिया पर इसके पहले भी  डाकिया पर मारपीट का आरोप लग चुका है।

3:: बीते दिनो समाजवादी के शिक्षा मंत्री कैबिनेट मंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह भी  अपनी मर्यादा लांगते नजर आये । गोंडा के व्यापारी पुत्र ने मंत्री के गाड़ी रोके जाने की खबर की कटिंग वाटस अप के ग्रुप में डाल दी थी फिर क्या था मंत्री जी का पारा सातवे आसमान पर पहुंच गया पंडित सिंह ने फोन पर सैकड़ो गाली दी और जान से मारने की धमकी भी  दी।

4::: पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री और योजना आयोग के सदस्य इकबाल अली ने भी  सरकार को बदनाम करने में कोई कमी नही की। फैजाबाद से लौटे हुए बाराबंकी के जैदपुर थाना क्षेत्र में लगे टोल टैक्स में पूर्व मंत्री के गुर्गो ने न सिर्फ टोल कर्मचारियों से मार पीट की बल्कि असलहों से फायरिंग की। पूर्व मंत्री के दंबगाई की ये तस्वीर टोल टैक्स पर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। पुलिस ने इस मामले में गनर और डाइवर को तो गिरफ्तकार कर लिया वहीं मंत्री को दूसरी गाड़ी में बैठा कर फरार करा दिया।
अगामी चुनाव में उठाना पड़ सकता है नुकसान
समाजवादी पार्टी के नेताओं और सरकार के मंत्री ही पार्टी के लिए खतरा बनते जा रहे है। जिस तरह से मंत्रियों और नेताओं पर आरोप लग रहे है उससे न सिर्फ सरकार की छवि खराब हो रही है बाल्कि उसके मिशन 2017 भी  खतरे में पड़ सकता है। हाल ही में सरकार के मंत्रियों और नेताओं पर हत्या,मारपीट, रंगदारी जैसे संगीन अपराधों में नाम आने से सरकार की काफी किरकिरी हुई है और सरकार की छवि को भी  काफी नुकसान हुआ है। विवादित बयान को लेकर भी  सरकार के कई मंत्रियों का नाम आये दिन आता रहता है। हाल में ही महिलाओं के ऊपर विवादित बयान देने वाले तोता राम मामले का मुख्यमंत्री ने स्वत: संज्ञान में लेते हुए फटकार लगाई थी उसके चंद दिन बाद ही राज्यमंत्री कैलाश चौरासिया द्वारा आरटीओ अधिकारी को मारने पीटने व रंगदारी मांगने का मामला प्रकाश में आया है। इन मामलों से साफ होता है कि सरकार के मंत्री ही मुख्यमंत्री की बात को गं•ाीरता से नहीं ले रहे है। ऐसे में सरकार के अगामी चुनाव की तैयारियों में ये मंत्री ही रोड़ा बनते जा रहे है।


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Monday, 8 June 2015

सिर्फ जिस्म ही नही ज़हेन भी छालनी कर जाता है एसिड अटेक


इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। एसिड अटैक एक अमानवीय और •ायावह अपराध है। एसिड अटैक अपराध हत्या जैसे जघन्य अपराध से •ाी खतरनाक है। एसिड अटैक के शिकार लोग जिंदा तो रहते है मगर समाजिक और मानसिक रूप से उनकी हत्या हो चुकी होती है। वो समाज में मिलने , उठने बैठने का आत्मविश्वास नहीं जुटा पाते। एसिड अटैक में शरीर के जिस •ाी हिस्से पर एसिड पड़ता है वो हिस्सा पूरी तरह झुलस जाता है खास कर जब चेहरे पर पड़ता है तो वो पूरी तरह झुलस जाता है और ऐसी •ायावह हालत में पीड़ित अपने चेहरे को आइने में •ाी देखने का साहस नही कर पाते हैं। ज्यादातर हमले में पीड़ित की मौत तो नही होती मगर उसकी बाकी बची जिंदगी मौत से •ाी बदतर हालत में गुजरती है।
एसिड अटैक का मकसद चेहरे को खराब करना होता हौ एसिड अटैक में चौथी डिग्री का बर्न होता है इसमें त्वचा की पहली नही बल्कि चौथी परत तक जल जाती है इसके घाव सही होने में सालों लग जाते है मगर फिर •ाी पहले जैसी त्वचा नही आ पाती। समय के साथ दिक्कतें कम होने के बजाय और बढ़ जाती हंै जिसके कारण पीड़ित को धूप मे निकलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।इसके शिकार लोगों को असीम दर्द के साथ समाज से इतर जिन्दगी जीनी पड़ती है।  क•ाी क•ाी उसको अपने ही घर में •ोद •ााव का दर्द झेलना पडता है।

क्या कहता है कानून
18 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने कानून में बदलाव करते हुए तेजाब को जहर की श्रेणी में रखा है। अब कोई •ाी दुकानदार बिना लाइसेंस के तेजाब नहीं बेच सकते है। इसके अलावा और •ाी संशोधन हुए है जिसमें पीड़िता को तीन लाख का मुआवजा दिया जायेगा। 15 दिन के अंदर एक लाख रूपये देना अनिवार्य है। आरोपी को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती हैं।

हादसों की वजह
एसिड अटैक की कई वजह हो सकती है जैसे दहेज की मांग न पूरी होना, घरेलू कलाह, शादी का प्रस्ताव ठुकरा देना, प्रेम प्रसंग, दुष्कर्म के प्रयास में विफल होना । ऐसे परिस्थिति होने में एसिड अटैक के केस ज्यादा होते है। लखनऊ में ही प्रेम प्रसंग और दुष्कर्म में विफल होने पर दो लड़कियों पर एसिड अटैक किया जा चुका है

सरकार नहीं करती मदद
सरकार की तरफ से एसिड अटैक में घायल युवती को पंद्रह दिन के अंदर आर्थिक मदद देने का सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आदेश दिया जा चुका है मगर इसके बाद •ाी सरकार की तरफ से इनको सही समय पर पैसा नही दिया गया है।
केस 1
समद कथा में काम करने वाली मीना के ऊपर घरेलू कलाह के चलते उनके पति ने ही तेजाब डाल दिया था। आज के समय में वो काम करके अपने तीनों बच्चों की परवरिश कर रही है उनका सबसे छोटा बेटा चौदह साल का हैं।


केस 2
2012 में आलमबाग निवासी कविता पर उनके प्रेमी ने ही तेजाब डाल दिया था। 25 वर्षीय कविता आरोपी नटखेडा निवासी फैज के शाप पर काम करती थी। वही दोनों के बीच अफेयर शुरू हो गया मगर कुछ महीनों बाद फैज की शादी हो गई । शादी हो जाने के बाद •ाी फैज कविता को लगातार रिलेशन में रहने का दवाब डालता रहा। कविता के मना करने पर उसके ऊपर फैज ने तेजाब डाल दिया। घटना के दो साल बाद •ाी आरोपी खुले आम घूम रहा है और कविता समाज से इतर जिंदगी जी रही है। साल में दो बार कविता की सर्जरी होती है। परिवार से सपोर्ट न मिलने के पर •ाी उसने हार नही मानी। वो समाज में जीने के लिए लगातार सघर्ष कर रही है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है।

केस 3
अशियाना निवासी 16 वर्षीय रेशम फातमा पर उनके रिश्तेदार ने ही बलात्कार का प्रयास किया। विफल रहने पर आरोपी ने रेशम के चेहरे पर तेजाब फेंक  दिया। हाल में ही रेशम को बेबी बे्रव अवार्ड •ाी दिया जा चुका है।


चुनाव आते ही दिखने लगा दलो का मुस्लिम प्रेम

इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय चुनावो में काफी हद तक निर्णायक भूमिका निभाते  है। चनाव आते ही मुस्लिम हित की बाते करने वाले नेताओं की लाइन लग जाती है लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनका कोई पुरसा हाल नही होता। 2017 में उत्तरप्रदेश के विधानसभ चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी  राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीके से प्रयास शुरू कर दिए हैं। प्रदेश के लगभग  17 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता किसी भी  राजनीतिक दल का भविष्य बनाने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाते  आये है। यह बात साफ है कि प्रदेश की 403 में से 100 से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदातों के द्वारा ही हार जीत का निर्णय होता है। हर बार की तरह इस बार भी  चुनाव आते ही सभी  प्रमुख दल सपा, कांग्रेस, बसपा मुस्लिमों को अपनी ओर रिझाने में लग गये है लेकिन इस बार मामला त्रिकोणी नहीं रहा क्योकि मुस्लिम विरोधी कही जाने वाली भाजपा  भी  इस बार मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जी तोड़ कोशिश में लगी है। फिलहाल अभी  ये कहना जल्दबाजी होगा कि प्रदेश का मुसलमान किसके साथ जायेगा। लेकिन ये बात तय कि इस बार मुसलमान जल्दी किसी के बहकावे में नहीं आने वाला है।
भाजपा  की कोशिश 
मुस्लिम विरोधी चेहरा होने के बावजूद भाजपा  इस बार मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने में लगी हुई है जबसे केंद्र में भाजपा  सरकार बनी है तबसे लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा मुसलमानों को देश भक्त  बताना और उनको पूरी सुरक्षा देने की बात कहना इस बात की ओर इशारा करता है कि मोदी सबका साथ सबका विकास वाले रास्ते पर चलकर प्रदेश का अगामी विधानसभा  चुनाव लड़ने की तैयारी में है। इसके अलावा केंद्र सरकार के एक साल पूरा होने पर जन जन जक सरकार की उपलब्धियां पहुंचाने के लिए पंपलेटो और बुक को उर्दू में छाप कर मुस्लिम बहुल इलाकों में बांटने के फैसले से विपक्षियों में हलचल मच गई है।

बसपा का भी  जागा मुस्लिम प्रेम
बसपा की बात की जाए, तो बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती मुसलमानों के नाम पर राजनीति तो खूब करती हैं, लेकिन वह सपा प्रमुख की तरह किसी मुस्लिम धर्म गुरु को अहमियत नहीं देती है।वहीं दूसरी तरफ सपा पर मुसलमानों को गुमराह करने का आरोप भी  जड़ देती हैं। बसपा सुपीमों को इस बार ये एहसास हो चला है कि अगामी विधानसभ  चुनाव में उनकी मुकाबला सिर्फ सपा से नहीं बल्कि भाजपा  से भी  होने वाला है यदि ऐसे में मुस्लिम समुदाय का समर्थन उनको नहीं मिला तो उनकी वहीं दुर्दशा हो सकती है जो 2012 के विधान सभा  चुनाव में हुई थी। इस बार  बसपा का इरादा किसी भी  तरह से सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाना है. देखना यह है कि वह अपने इरादों में कितना कामयाब होती है।

सपा भी  जुटी अपना मुस्लिम वोट बैक बचाने में
सपा ने 2012 के विधानसभा  चुनाव घोषणापत्र में 16 खास वादे किये थे तीन साल गुजर जाने के बावजूद उन पर अमल नहीं हुआ। सपा के मुस्लिम समुदाय से किये गये चुनावी वादो में सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्र आयोग और निमेष आयोग की सिफारिशों को लागू करना , मुसलमानों को रोजगार देना, आरक्षण देना और पिछड़े मुस्लिम इलाकों में स्कूल खोलना आदि थे। मुस्लिम समुदाय को सुरक्षा देने की भी  बात की गई थी मगर सरकार में हुए संप्रदायिक दंगों ने सपा की छवि पर बट्टा लगाने का काम किया है। इसके बावजूद सपा मुखिया और प्रदेश मुखिया मुस्लिम समुदाय सपा से जोड़कर रखने की कोशिश में लगे हुए है। अभी  हाल में ही उर्दू एकादमी का भी  उदघाटन किया है।

कांग्रेस भी  पीछे नहीं
अजादी के बाद प्रदेश में कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था मगर मौजूदा समय में प्रदेश की राजनीति नाम मात्र की रह गई है। पिछल्ले दो दशकों से कांग्रेस का प्रदेश में जनाधार लगातार गिरता ही गया है। उसका अपना वोट बैंक खिसक कर दूसरी पार्टियों में चला गया है । इसबार के लोकसभा  चुनाव के बाद तो प्रदेश में कांग्रेस की और दुर्दशा हो गई है। पार्टी प्रमुख जानते है कि इस बार प्रदेश के विधानसभा  चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा तो ये चुनाव उनके लिए संजीवनी बूटी का काम करेगी। इसी के तहत पार्टी अन्य समुदाय के साथ मुस्लिम समुदाय को भी  जोड़ने में लगी है। सपा सरकार पर दंगे को लेकर हमलावर होना या केंद्र की मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी बताना पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक प्रेम को दर्शाता है।

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Saturday, 6 June 2015

अब नही भाती गुरुओ की पाठशाला

इन्टरवल एक्सप्रेस
लखनऊ। साल दर साल यूपी बोर्ड के रिजल्ट के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होती जा रही है मगर इसके साथ ही यूपी बोर्ड के हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में बच्चों की संख्या भी  कम होती जा रही है। पहले दस साल की अपेक्षा में अब यूपी बोर्ड के स्कूलों से लोगों का मोह भंग  होता जा रहा है। जिसका मुख्य कारण दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में वृद्धि और यूपी बोर्ड के स्कूलों में शिक्षा का गिरता स्तर है।
स्कूलों में वृद्धि छात्रो में गिरावट
यूपी बोर्ड के स्कूलो में लगातार बढोत्तरी हो रही है मगर उसके साथ ही उसमें प्रवेश लेने वालो छात्रो की संख्या में गिरावट हो रही है। मौजूदा समय में राजधानी में यूपी बोर्ड के स्कूलों की संख्या 720 है। पिछल्ले कुछ समय में स्कूलों की संख्या मे तेजी से इजाफा हुआ है। इस बार भी  यूपी बोर्ड की मान्यता लेने में दर्जनों स्कूल लाइन लगाये हुए है। जिस तेजी से यूपी बोर्ड मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ रही है उतनी ही तेजी से छात्रों की संख्या घट भी  रही है।
दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की संख्या बढ़ी
आज से एक दशक पहले तक यूपी बोर्ड के स्कूलों का बोलबाला था फिर राजधानी में दिल्ली बोर्ड के स्कूलों ने दस्तक दी और देखते देखते इन स्कूलों ने अपनी छाप बना ली। इनकी चमक के आगे सरकारी स्कूलों की छवि धूमिल हो गई। एक दशक पहले इन स्कूलों की संख्या दस से पंद्रह थी मगर मौजूदा समय में इन स्कूलों की संख्या 200 से भी  अधिक है।


शिक्षा स्तर में फर्क
यूपी बोर्ड और दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में शिक्षा के स्तर में भी  काफी फर्क है जिसकारण अच्छी शिक्षा ग्रहण करने और अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में अभिभावक  यूपी बोर्ड के स्कूलों के बजाये दिल्ली बोर्ड के स्कूलों को ज्यादा प्रथमिकता दे रहे है। यूपी बोर्ड में थोक के भाव स्कूलों में मान्यता दे दी है। इसके अलावा अगर दोनो बोर्ड के स्कूलो की पढ़ाई में तुलना की जाये तो दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की पढ़ाई यूपी बोर्ड की तुलना में ज्यादा हाई टेक है। यूपी बोर्ड के ज्यादातर स्कूलों में आज भी  अंग्रेजी को प्रायामिकता से नहीं पढ़ाया जाता है जबकि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में जो शिक्षा दी जाती है वो कंपीटिशन लेविल की होती है जिससे बच्चों को शुरु से ही उच्च स्तर की शिक्षा मिलने के कारण वो आगे कंपटिशन में आसानी से आगे निकल जाता है। पढ़ाई के साथ अनुशासन के मामले में •ाी दिल्ली बोर्ड यूपी बोर्ड से काफी आगे है।
वर्जन अभिभावक 
 खुर्रम नगर निवासी आमिर तस्लीम की बेटी शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में पड़ती है। यूपी बोर्ड के स्कूूल में एडमिशन न करवा आईएससीई बोर्ड के स्कूल में एडमिशन करवाने के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अनुशासन शिष्टाचार के चलते यूपी बोर्ड में एडमिशन नहीं दिलवाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाई के साथ अनुशासन भी  सिखाया जाता है जिसके कारण बच्चों शिक्षा के साथ अच्छा व्यवहार भी  सिखने को मिलता है।

2:::: अशियाना निवासी सिराज के दो बेटे है और दोनो ही दिल्ली बोर्ड के स्कूल में पढ़ते है। उन्होने कहा कि प्रतिस्पर्धा के दौर में अच्छी पढ़ाई ही बच्चो का भविष्य तय करती है यदि उनको अच्छी शिक्षा न मिल पाये तो उनका भविष्य भी  अंधकार मय हो जाता है। जहां तक यूपी बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाई का मामला है तो वो अभी  दिल्ली बोर्ड के स्कूलो से काफी दूर है।

स्कूल प्रधानाचार्य का वर्जन
लखनऊ पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य रुपाली पटेल ने बताया कि दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में जो पढ़ाई होती है वो प्रतिस्पर्धा स्तर की होती है जिससे बच्चे आगे जाकर किसी इंजीनियरिंग या किसी और तरह के कंपीटिशन  में भाग  लेते है तो उनको स्कूल में पढ़ाई का काफी फायदा मिलता है। इसके अलावा कहां एडमिशन लेना है कहां नहीं ये अभिभावक  और बच्चों का फैसला होता है । दिल्ली बोर्ड के स्कूलों में कंपीटिशन बेस पढ़ाई कराई जाती है। अच्छी पढ़ाई केसाथ बच्चों को अनुशासन में रहना •ाी सिखाया जाता है।

2::: खुर्रम नगर गर्ल्स कालेज के प्रधानाचार्य मोहम्मद तारिक के अनुसार यूपी बोर्ड में के ज्यादातर स्कूल हिंदी मीडियम है जबकि आजके समय में अंग्रेजी का अपना अलग महत्व है उसके बिना  अच्छी नौकरी नहीं मिलती है। इसके अलावा मान्यता देने में यूपी बोर्ड सबसे आगे है जिसके कारण हर गल्ली में स्कूल खुल गये है। उन स्कूलों को भी  मान्यता दे दी है जहां पर पढ़ाई ही नहीं होती इससे यूपी बोर्ड के साख पर असर पड़ा है।
वर्जन
वर्तमान समय में दिल्ली बोर्ड के स्कूलों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है जिसके चलते लोगों के पास विकल्प है। यूपी बोर्ड के स्कूलों में जहां तक शिक्षा के स्तर की बात है वो भी  इतना खराब नहीं है। इस बार के यूपी बोर्ड के रिजल्ट भी  काफी अच्छे गये है। :::::::::: प्रेम चंद बीएस ओ माध्यमिक शिक्षा


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