Tuesday, 24 February 2015

कांग्रेस के लिए दिल्ली चुनाव ने बजाई खतरे की घंटी

 लखनऊ। 16वीं लोकसभा के आम चुनाव और उसके बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के जनाधार में लगातार गिरावट होती जा रही है। हाल में ही हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद इस बात पर भी सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या वाकई में कांग्रेस मुक्त भारत  की शुरूआत हो गई है। दिल्ली से इसको जोड़कर इसलिए देखा जाना जरूरी है क्योंकि दिल्ली कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। लगातार 15 साल तक दिल्ली पर कांग्रेस का कब्जा रहा है, लेकिन बीते चुनाव में 70 सीटों में से एक भी  सीट नहीं जीत पाई। इसके अलावा उसके मत प्रतिशत में गिरावट आई है।
अर्श से फर्श की ओर
आजादी के बाद कांग्रेस सबसे मजबूत राजनीतिक दल के रूप में उभरी। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पार्टी ने पहले संसदीय चुनावों में शानदार सफलता पाई और ये सिलसिला 1967 तक अनवरत चलता रहा। नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक समाजवाद और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को सरकार का मुख्य आधार बनाया, जो कांग्रेस पार्टी की पहचान बनी।  इन्दिरा गांधी के समय में भी  कांग्रेस ने कई उतार चढ़ाव देखे। मगर, इन्दिरा और कांग्रेस में मौजूद वरिष्ठ नेताओं की कूटनीति के दम पर कांग्रेस ने फिर से आम आदमी का भरोसा  जीत लिया। 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की भी  बम विस्फोट में मौत के बाद कांग्रेस को 232 सीटें मिलीं। इसके बाद कांग्रेस का जनाधार लगतार गिरता गया और वर्ष 1999 में 114 रह गईं। हालांकि 2004 के चुनावों में उसे 145 सीटें मिलीं। पार्टी ने सहयोगी दलों के सहारे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए का गठन किया। कांग्रेस को 2009 के लोकसभा  चुनाव 206 सीटें मिली थीं। 15वीं लोकसभा  चुनाव के बाद कांगे्रस के  जनाधार में गिरावट शुरू हो गई थी, जिसमें अन्ना हजारे के जनलोकपाल को लेकर चलाए आंदोलन ने आग में घी का काम किया। भाजपा ने कांग्रेस से आम आदमी की पार्टी का लेबल छीन कर उसको अरबपति और बड़े लोगों की पार्टी बना दिया। इस बहाने कांगे्रस का वोट बैंक भी  अपनी तरफ कर लिया।
लगातार गिर रहा जनाधार
2014 के आम चुनावों में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी और पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई। इसके महज नौ महीने बाद ही दिल्ली उसकी ऐसी दुर्गति हुई कि पार्टी अपनी मौजूदगी तक दर्ज न करा सकी। इसके अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, झारखंड में भी  कांग्रेस के चुनाव हारने के साथ ही पिछले चुनावों की तुलना में इस बार मत प्रतिशत में भी  काफी कमी आई है। दिल्ली के इन नतीजे की धमक आने वाले चुनावों में कांग्रेस के लिए भारी  पड़ने वाली है। अब भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी भी  कांग्रेस के लिए मुसीबत बनती जा रही है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात उसका घटना जनाधार है। दलित, मुस्लिम और गरीब जो कांग्रेस का मजबूत जनाधार हुआ करता था, वह धीरे-धीरे दूसरी ओर खिसक रहा है।
नेतृत्व पर उठते सवाल
16 वीं लोकसभा  चुनाव के बाद और प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद उसके नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े होने लगे है । पार्टी के भीतर ही नहीं जनता में भी  उसका भरोसा  उठता नजर आ रहा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ कार्यकर्ता कई बार बगावत का बिगुल फूंक चुके हैं। प्रियंका गांधी को नेतृत्व देने को लेकर कई बार तो पार्टी के भीतर की नाराजगी सड़कों पर पोस्टर और बैनर के जरिये भी नजर आ चुकी है।
विपक्ष के तौर पर विफल
जिस तरह से आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई है उस तरह तो वो एक मजबूत विपक्ष की भूमिका भी नहीं निभ  पा रही है। राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर बतौर विपक्ष पार्टी के प्रदर्शन से लोगों की उम्मीदें टूटी हैं। चाहे लोकसभा  में विपक्ष के तौर पर हो या गुजरात, यूपी, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड, जैसे राज्यों में पार्टी विपक्ष की भूमिका  में लगातार जूझती और अस्तित्व बचाती नजर आ रही है।

कार्यकतार्ओं का गिरता मनोबल

पिछले चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस की हार हुई है उससे उसके जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकतार्ओं का मनोबल टूटा है। पार्टी के बड़े नेताओं और कार्यकतार्ओं के बीच वाद संवाद भी  इस स्तर पर नहीं होता है, जिससे उनमें कोई सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिले। इसके अलावा पार्टी के जमीनी स्तर के संगठन और कैडर निष्क्रिय पडेÞ हुए हैं।

इनसेट:::

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पिछले चुनाव की अपेक्षा 16.22 प्रतिशत मत कम हो गए। इसके अलावा विधानसभा चुनावों में दिल्ली में 2013 में 24.55 प्रतिशत तो 2015 में 9.7 प्रतिशत ही वोट मिला। राजस्थान के 2008 के चुनाव में 36.82 प्रतिशत वोट मिला, वहीं 2013 के चुनाव में 33.7 प्रतिशत वोट मिला। महाराष्ट्र के 2009 के चुनाव में 21.1 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ, वहीं 2014 के चुनाव में घटकर 18 प्रतिशत रह गया। जम्मू कश्मीर के 2008 के चुनाव में 18 प्रतिशत था वहीं, 2014 में 17 प्रतिशत हो गया।

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